February 9, 2026

यूजीसी का ‘इक्विटी एजेंडा’ या सियासी प्रयोग ? यूपी से उठती लपटें और दिल्ली तक जाती आँच!

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उच्च शिक्षा में बराबरी के नाम पर सत्ता के सलाहकारों ने

क्या एक नया राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर दिया है ?

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

उत्तर प्रदेश की सियासत इन दिनों जिस उथल-पुथल से गुजर रही है, वह महज़ एक राज्य तक सीमित रहने वाली नहीं दिखती। संकेत साफ़ हैं, इसका असर आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति को भी अपनी गिरफ्त में ले सकता है। वजह है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) का नया और बहुचर्चित नियम “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026”, जिसने जनरल कैटेगरी यानी सवर्ण समाज के बीच तीखी नाराज़गी और असंतोष को जन्म दे दिया है।

यूजीसी के इस नए फरमान के तहत देश के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों को 24×7 हेल्पलाइन, इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी स्क्वाड और इक्वलिटी कमेटी गठित करनी होगी। नियमों की अनदेखी पर मान्यता रद्द करने से लेकर फंड रोकने तक की चेतावनी भी दी गई है। काग़ज़ पर यह सब ‘बराबरी’ और ‘समावेशन’ की भाषा में लिपटा हुआ है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं ज़्यादा सियासी रंग लिए हुए नज़र आती है।

यह कहना किसी पूर्वाग्रह का परिणाम नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के अनुभव से निकला निष्कर्ष है कि जब भी देश में ऐसे नियम लाए जाते हैं, उनके पीछे सामाजिक न्याय से ज़्यादा राजनीतिक लाभ-हानि का गणित पहले ही बैठा लिया जाता है। सवाल यही है कि जब यूपी और देश की राजनीति सतह पर अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई दे रही थी, तो अचानक ऐसे विवादास्पद नियम लाने की हड़बड़ी क्यों मची ?

यहाँ सत्ता के उन अदृश्य सलाहकारों पर सवाल उठना लाज़िमी है, जो शायद वातानुकूलित कमरों में बैठकर ज़मीनी समाज को प्रयोगशाला की तरह देखते हैं। क्या उन्हें यह एहसास है कि समाज कोई एक्सेल शीट नहीं, जिसे मनचाहे फार्मूले से बैलेंस कर लिया जाए ? या फिर उन्हें भरोसा है कि हर असंतोष को ‘मैनेज’ कर लिया जाएगा ?

इन सवालों के बीच एक और बहस तेज़ हो गई है, क्या बीजेपी सवर्ण समाज को अपनी स्थायी जागीर मान चुकी है ? अगर ऐसा है, तो यह राजनीतिक आत्मविश्वास नहीं, बल्कि ओवर-कॉन्फिडेंस का क्लासिक मामला कहा जाएगा। इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में जब भी किसी वर्ग को ‘कन्फर्म वोट बैंक’ समझ लिया गया, तब-तब सत्ता के हाथ से ज़मीन फिसली है।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को जो झटका लगा, उसके पीछे कई कारण गिनाए गए। उनमें से एक अहम कारण विपक्ष की वह रणनीति भी मानी गई, जिसमें संविधान बदलने की आशंका को पिछड़े और अति-पिछड़े वर्ग के बीच प्रभावी ढंग से रखा गया। अब जबकि यूपी विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं, तो यह सवाल और भी तीखा हो जाता है, क्या यूजीसी का यह नया कानून उसी सामाजिक समीकरण को साधने की एक कोशिश है ?

अगर जवाब ‘हाँ’ है, तो सत्ता को अतीत के पन्ने ज़रूर पलटने चाहिए। मंडल बनाम कमंडल की राजनीति ने कभी देश की सत्ता संरचना को जड़ से हिला दिया था। इतिहास यह भी बताता है कि सामाजिक इंजीनियरिंग जब ज़रूरत से ज़्यादा कृत्रिम हो जाती है, तो उसका रिएक्शन उतना ही विस्फोटक होता है।

विडंबना यह है कि एक तरफ़ देश मंगल तक पहुँच चुका है, तकनीक और विज्ञान नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं, और दूसरी तरफ़ सत्ता आज भी “बाँटो और राज करो” की पुरानी स्क्रिप्ट से बाहर नहीं निकल पा रही। बराबरी की दुहाई देने वाला यह कदम, व्यवहार में समाज को और खाँचों में बाँटने वाला साबित हो सकता है।

साफ़ है, इससे न तो शिक्षा व्यवस्था मज़बूत होगी, न सामाजिक सौहार्द। अगर समय रहते सरकार और उसके सलाहकार नहीं चेते, तो यह ‘इक्विटी’ का प्रयोग राजनीतिक असंतोष की ऐसी चिंगारी बन सकता है, जिसकी आग को बुझाना आसान नहीं होगा। सत्ता के गलियारों में बैठे रणनीतिकारों को यह समझना होगा कि समाज को बार-बार सियासी मोहरे की तरह इस्तेमाल करने की कीमत अंततः सत्ता को ही चुकानी पड़ती है।

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