जब सरसों का साग सिर्फ खाना नहीं, संस्कार हुआ करता था!!

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सर्दियों की थाली का शाही सितारा है सरसों का साग

पोषण का खजाना: एक कटोरी साग, अनेक फायदे

NEWS1UP

हेल्थ डेस्क

कभी सर्दियों की सुबह धुंध से ढकी होती थी और आंगन में चूल्हे की आंच पर रखी कड़ाही से उठती सरसों के साग की खुशबू पूरे घर को जगा देती थी। अम्मा, नानी या दादी, किसी के भी हाथों में लकड़ी की कलछी होती, पर उस कलछी में सिर्फ साग नहीं पकता था, उसमें अनुभव, अपनापन और पीढ़ियों की समझ घुली होती थी। साग उबालते-उबालते वे जानती थीं कि कब आंच धीमी करनी है, कब मक्के का आटा डालना है और कब देसी घी का तड़का डालकर स्वाद को मुकम्मल करना है। यह हुनर किताबों से नहीं, जीवन से सीखा गया था।

आज रसोई में गैस है, मिक्सर है, रेसिपी वीडियो हैं, लेकिन वह धैर्य, वह अंदाज़ और वह आत्मीयता धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। सरसों का साग अब मौसम की पहचान नहीं, बल्कि “कभी-कभार बनने वाली डिश” बन गया है। नई पीढ़ी की गृहणियों के हाथों में समय की कमी है, परंपरा की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है। जो बात अम्मा, नानी-दादी के हाथों में थी, वह सिर्फ स्वाद नहीं, सेहत की समझ और मौसम के साथ जीने की कला थी, वह आज कम ही दिखती है।

पोषण का पावरहाउस

सरसों का साग पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें विटामिन A, C, K और E के साथ फोलेट, आयरन, कैल्शियम और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये तत्व आंखों की रोशनी बढ़ाते हैं, इम्युनिटी को मजबूत करते हैं, हड्डियों और दांतों को सुदृढ़ बनाते हैं तथा त्वचा को स्वस्थ और चमकदार रखते हैं।  इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और ग्लूकोसाइनोलेट्स शरीर को डिटॉक्स करते हैं और कोशिकाओं को क्षति से बचाते हैं।

आयुर्वेद की दृष्टि से क्यों खास है सरसों का साग ?

आयुर्वेद सरसों के साग को बल्य और रसायन मानता है। इसकी तासीर गर्म होती है, जो सर्दियों में बढ़े हुए वात और कफ दोष को संतुलित करती है। पाचन शक्ति बढ़ाता है, शरीर में आंतरिक गर्माहट बनाए रखता है, सर्दी-जुकाम, जोड़ों के दर्द और सुस्ती में राहत देता है और रक्त संचार सुधारकर मानसिक थकान दूर करता है। यही वजह है कि इसे सर्दियों का “स्वास्थ्य कवच” कहा जाता है।

सरसों का साग बनाने का सही और पारंपरिक तरीका

सरसों का साग जितना सरल दिखता है, उतना ही समझदारी से पकाने की ज़रूरत होती है ताकि इसके पोषक तत्व सुरक्षित रहें।

सामग्री

1½ किलो सरसों के पत्ते

250 ग्राम पालक

250 ग्राम बथुआ

50 ग्राम मकई का आटा

4 हरी मिर्च (कटी हुई)

20 लहसुन की कलियां

3 बड़े प्याज

2 इंच अदरक

1 टी-स्पून हल्दी

1 कप पानी

4 टेबल स्पून देसी घी

विधि

साग को साफ कर काटें और अच्छी तरह धो लें।

प्रेशर कुकर या पैन में मकई के आटे को छोड़कर सारी सामग्री डालें।

6–7 मिनट ढककर पकाएं (कड़ाही में हों तो धीमी आंच पर पकाएं)।

पके साग को मकई के आटे के साथ ब्लेंड करें।

दोबारा पैन में डालकर 25–30 मिनट धीमी आंच पर पकाएं।

तड़के के लिए घी में प्याज सुनहरा होने तक भूनें और साग में मिलाएं।

गरमागरम साग को कच्ची प्याज, हरी मिर्च और मक्खन या देसी घी के साथ परोसें।

मक्की की रोटी क्यों है सबसे बेहतरीन संगत ?

सरसों का साग और मक्की की रोटी, यह सिर्फ स्वाद का मेल नहीं, बल्कि पोषण का भी परफेक्ट कॉम्बिनेशन है। मक्की की रोटी साग के पोषक तत्वों के अवशोषण को बेहतर बनाती है और लंबे समय तक ऊर्जा देती है।

खाने का सही समय और सावधानियां

सरसों का साग दोपहर के भोजन में गरम-गरम खाना सबसे लाभकारी होता है। इसे दही या ठंडी चीज़ों के साथ न लें। कमजोर पाचन वाले लोग सीमित मात्रा में सेवन करें। थायरॉइड या पथरी की समस्या वाले लोग अधिक मात्रा से बचें, क्योंकि इसमें गोइट्रोजेंस और ऑक्सालेट्स होते हैं।

आयुर्वेद विशेषज्ञ मानते हैं कि सर्दियों में संतुलित मात्रा में सरसों के साग का सेवन इम्युनिटी को मजबूत करता है और मौसमी बीमारियों से बचाव करता है। स्वाद, सेहत और परंपरा, तीनों का संगम है सरसों का साग। इस सर्दी इसे अपनी थाली में ज़रूर शामिल करें, क्योंकि कुछ व्यंजन सिर्फ पेट नहीं, पूरे शरीर को तंदुरुस्त रखते हैं।

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