क्या अब सवाल पूछना गुनाह है ?
NEWS1UP
विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। राजधानी के शैक्षणिक दिल कहे जाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय का नॉर्थ कैंपस शुक्रवार को वैचारिक टकराव का अखाड़ा बन गया। यूजीसी कानून के समर्थन में निकाली गई रैली के बीच एक युवा महिला सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के साथ कथित बदसलूकी, धक्का-मुक्की और जाति पूछे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि उसने जैसे ही यूजीसी कानून पर सवाल उठाए, कुछ छात्रों ने उसे घेर लिया, नाम के “टाइटल” पर आपत्ति जताई और हाथापाई पर उतर आए।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, युवती भीड़ के बीच फंस गई थी। मौके पर मौजूद पत्रकारों को भी हटाने की कोशिश की गई। हालात बिगड़ते देख पुलिस ने हस्तक्षेप किया और युवती को सुरक्षित बाहर निकाला। घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें अफरातफरी साफ दिखाई देती है।

यूजीसी कानून पर तकरार, सड़क पर सियासत
बताया जा रहा है कि यूजीसी के नए एक्ट के समर्थन में रैली निकाली गई थी, जबकि इस कानून पर 19 तारीख को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई प्रस्तावित है। अदालत में मामला लंबित होने के बावजूद कैंपस में माहौल गर्म रहा। सवाल पूछने पर विवाद भड़कने से यह बहस और तीखी हो गई है कि क्या अब विश्वविद्यालय परिसर संवाद की जगह टकराव का केंद्र बनते जा रहे हैं ?
घटना के बाद मॉरिस नगर पुलिस स्टेशन के बाहर देर रात तक छात्रों का जमावड़ा लगा रहा। दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर नारेबाजी होती रही। युवती ने भी थाने में शिकायत दर्ज कराई है।
छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने घटना को “महिला सशक्तिकरण के दावों की पोल खोलने वाली” बताया और कहा कि एक फ्रीलांसर पत्रकार से जाति पूछना और धक्का-मुक्की करना अस्वीकार्य है। दूसरी ओर, विरोधी छात्र संगठनों ने आरोपों को सियासी रंग देने की कोशिश बताया है।
बड़ा सवाल
यह पूरा घटनाक्रम कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है कि क्या अब कैंपस में सवाल पूछना जोखिम भरा हो गया है ? क्या वैचारिक असहमति का जवाब भीड़तंत्र से दिया जाएगा ? और क्या अदालत में लंबित मुद्दों पर सड़क की राजनीति विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक संस्कृति को प्रभावित कर रही है ?
फिलहाल पुलिस जांच जारी है, लेकिन इतना साफ है कि देश की राजधानी का प्रतिष्ठित परिसर एक बार फिर विचारधाराओं की जंग का मैदान बन चुका है। आने वाले दिनों में समर्थक और विरोधी गुटों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।