February 9, 2026

हाउस टैक्स विवाद: नगरवासियों को निचोड़ता नगर निगम!!

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कोर्ट में मामला, फिर भी वसूली पर अड़ा निगम

सरकार के संज्ञान में पूरा प्रकरण!

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। शहर में हाउस टैक्स अब महज़ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि जनभावनाओं से जुड़ा एक बड़ा मसला बन चुका है। नगर निगम द्वारा हाउस टैक्स की दरों में 300 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी का निर्णय शहरवासियों के लिए भारी पड़ता दिख रहा है। यह फैसला अब निगम प्रशासन के लिए भी गले की फांस बनता जा रहा है। बढ़ते जनविरोध, राजनीतिक असहमति और न्यायालय में लंबित प्रकरण के बीच यह मुद्दा दिन-ब-दिन और जटिल होता जा रहा है।

सरकार के संज्ञान में मामला: असीम अरुण 

प्रेसवार्ता के दौरान मंत्री असीम अरुण  साथ में महानगर अध्यक्ष मयंक गोयल, जिलाध्यक्ष चैनपाल सिंह, विधायक अजीत पाल त्यागी, नंदकिशोर गुर्जर व अन्य

शुक्रवार को योगी सरकार में समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि हाउस टैक्स से जुड़ा प्रकरण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में है और सरकार हाई कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा कर रही है। हालांकि, इसी बयान के समानांतर नगर निगम प्रशासन की ओर से वसूली तेज करने के संकेतों ने जनता के आक्रोश को और भड़का दिया है।

वसूली के एलान से भड़का विरोध

नगरायुक्त के ‘वसूली तेज अभियान’ बयान के बाद लामबंद होते नगरवासी

हाल ही में नगर आयुक्त द्वारा यह घोषणा की गई कि 15 जनवरी से बड़े बकायेदारों की सूची तैयार कर हाउस टैक्स वसूली में तेजी लाई जाएगी। इस बयान के बाद ही शहर में विरोध की चिंगारी तेज़ी से फैल गई। व्यापारिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, आरडब्ल्यूए और विभिन्न आवासीय सोसाइटियों ने बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। डोर-टू-डोर हस्ताक्षर अभियान चल रहे हैं, अलग-अलग इलाकों में बैठकों का दौर जारी है और “सुविधा नहीं तो टैक्स नहीं” जैसे नारे गूंजने लगे हैं।

जनता का सवाल: टैक्स से नहीं, अन्याय से आपत्ति

बढ़ी टैक्स दरों के विरोध में प्रदर्शन करते शहरवासी (फाइल फोटो)

आंदोलनरत संगठनों का कहना है कि जनता टैक्स देने से कभी पीछे नहीं हटी, लेकिन टैक्स न्यायोचित और व्यावहारिक होना चाहिए। उनका सवाल है कि जब नगर निगम की बोर्ड बैठक में स्वयं महापौर ने, सांसदों, मंत्रियों और विधायकों की मौजूदगी में बढ़ी हुई दरें लागू न करने की घोषणा की थी, तो फिर जनता पर यह अतिरिक्त बोझ कैसे थोपा जा रहा है? और जब मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है, तब जबरन वसूली की जल्दबाज़ी किसके निर्देश पर की जा रही है?

बोर्ड का सर्वसम्मत निर्णय, फिर भी वसूली क्यों ?

इस पूरे प्रकरण में दो बातें सबसे अधिक चौंकाने वाली हैं। पहली, निगम बोर्ड की उस बैठक का सर्वसम्मत प्रस्ताव, जिसमें यह तय हुआ था कि जनता पर बढ़ी हुई दरें नहीं थोपी जाएंगी। इसके बावजूद निगम प्रशासन का उसी बढ़ी हुई दरों पर अड़े रहना कई सवाल खड़े करता है। इससे यह धारणा बन रही है कि शायद कोई ऐसी शक्ति या दबाव है, जो जनप्रतिनिधियों के निर्णय से भी ऊपर काम कर रहा है।

मुख्यमंत्री की निर्णायक छवि से जनता की उम्मीद बरकरार

दूसरी अहम बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कथित रूप से इस मामले की पूरी जानकारी है। जनप्रतिनिधियों द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्र भी सार्वजनिक हो चुके हैं, जिनमें टैक्स को न्यायसंगत बनाने की मांग की गई है। योगी आदित्यनाथ की छवि एक ऐसे मुख्यमंत्री की है जो त्वरित और कठोर फैसलों के लिए जाने जाते हैं। प्रदेश में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां 24 घंटे के भीतर न्याय होता दिखा है। ऐसे में गाजियाबाद के लाखों करदाताओं का यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि सरकार कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही है, तो निगम प्रशासन किसके आदेश पर बढ़ी हुई दरों से वसूली और बकायेदारों की सूची तैयार कर रहा है ?

सत्ता पक्ष में भी असहमति, विपक्ष अब तक मौन

राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला असामान्य है। आश्चर्य की बात यह है कि इस अत्यधिक बढ़ोतरी का विरोध किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के पार्षदों से लेकर शीर्ष जनप्रतिनिधियों ने किया है। हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले पूर्व पार्षद भी भाजपा से ही जुड़े रहे हैं। इसके बावजूद यदि समय रहते इस विवाद का समाधान नहीं हुआ, तो राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को भुनाने में देर नहीं लगाएगा। आने वाले विधानसभा चुनावों में यह हाउस टैक्स विवाद एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर सकता है।

न्याय की प्रतीक्षा में गाजियाबाद

फिलहाल गाजियाबाद की जनता न्याय की आस लगाए बैठी है। सवाल सिर्फ टैक्स का नहीं, बल्कि भरोसे का है, प्रशासनिक निर्णयों पर, जनप्रतिनिधियों के वचनों पर और उस शासन प्रणाली पर, जो “जनहित सर्वोपरि” का दावा करती है। अब देखना यह है कि सरकार और निगम प्रशासन इस जनआक्रोश को संवाद और संवेदनशीलता से सुलझाते हैं या यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक तूफान बनकर उभरता है।

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