मोकामा: दुलारचंद की हत्या से फिर उठा सवाल! क्या इस धरती पर कभी खत्म होगी खून की दास्तान ?

0

खेतों की हरियाली अब बारूद की गंध में बदल गई!

NEWS1UP

पॉलिटिकल डेस्क 

नई दिल्ली/पटना: मोकामा.. नाम सुनते ही अब उद्योगों की नहीं, गोलियों की गूंज याद आती है। कभी यह धरती कारखानों के धुएं से महकती थी, पर आज वही हवा बारूद से भरी है। 1980 का दशक, जब बिहार राजनीति की नई भाषा सीख रहा था, मोकामा ने बुलेटों में अपनी सियासी जुबान लिखी। सत्ता की कुर्सी हो या जमीन की जिद, यहां हर लड़ाई में बंदूकें बोलीं और बदले की आग में कई घर राख हो गए।

जहाँ कारखानों का धुआं बारूद में बदल गया

रेलवे यार्ड, फर्टिलाइज़र फैक्ट्री, इंजिन रिपेयर शॉप और गंगा किनारे का टाल क्षेत्र, कभी मोकामा के विकास की पहचान थे। गंगा की नमी और मेहनतकशों की पसीने से सिंचित यह इलाका ‘उद्योग नगरी’ कहलाता था। लेकिन 1980 के दशक में धीरे-धीरे अपराध ने इस औद्योगिक पट्टी की बागडोर संभाल ली। टाल की उपजाऊ जमीनें खेती से ज़्यादा वर्चस्व की जंग का मैदान बन गईं। और इन्हीं गलियों से निकला एक नाम, अनंत सिंह, जिन्हें आज भी लोग “छोटे सरकार” के नाम से जानते हैं।

अनंत सिंह: खाक से सत्ता तक, फिर सलाखों के पार

मोकामा के लदमा गांव में 1961 में जन्मे अनंत सिंह ने गरीबी से नहीं, गोली से अपनी पहचान बनाई। भूमिहार समाज से आने वाले अनंत 1990 के दशक में राजनीति की सीढ़ी पर चढ़े और विधायक बने, कभी जेडीयू से, कभी राजद से। 2019 में उनके घर से AK-47 और ग्रेनेड बरामद हुए, जिसके बाद उन्हें 10 साल की सजा हुई। हालांकि 2024 में वे अदालत से बरी हुए और 2025 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार के रूप में फिर मैदान में उतर आए। उन पर अपहरण, रंगदारी, हत्या के प्रयास जैसे 30 से अधिक केस दर्ज हैं। लेकिन स्थानीय राजनीति में उनका प्रभाव आज भी अडिग है, समर्थकों के लिए वे “रॉबिनहुड”, और विरोधियों के लिए “भय का दूसरा नाम” हैं।

दुलारचंद यादव: टाल के पुराने बादशाह

गंगा किनारे बसे टाल क्षेत्र में दशकों तक दुलारचंद यादव का नाम डर का पर्याय था। 1980 के दशक से लेकर 2010 तक उन्होंने इलाके में राज किया, रंगदारी, ज़मीन कब्ज़ा और गैंगवार में लिप्त रहते हुए भी एक “स्थानीय नेता” की हैसियत बनाए रखी। 76 वर्षीय दुलारचंद 2025 के चुनाव में जन सुराज पार्टी (प्रशांत किशोर की पार्टी) के लिए प्रचार कर रहे थे। बीती 30 अक्टूबर को घोसवारी में प्रचार के दौरान गोलियों की गूंज सुनाई दी, और दुलारचंद गिर पड़े। FIR में अनंत सिंह और उनके समर्थकों के नाम दर्ज हुए। परिवार ने आरोप लगाया कि “छोटे सरकार” ने हत्या कराई, जबकि अनंत सिंह का दावा है कि “यह सूरजभान के गुट की साजिश है।” सूत्र बताते हैं कि दुलार चंद की हत्या उनके परिवार में तीसरी हत्या है, जिसका आरोप दुलार चंद के परिजन अनंत सिंह पर लगा रहे हैं। 

गैंगवार की जड़ें: जात, ज़मीन और ज़हर

मोकामा में अपराध की जड़ें सिर्फ राजनीति में नहीं, जातीय और आर्थिक असमानताओं में भी धंसी हैं। भूमिहार और यादव समाज के बीच दशकों से चला आ रहा वर्चस्व का संघर्ष यहां अक्सर खूनी गैंगवार का रूप ले लेता है। अनंत सिंह का गुट भूमिहार समाज का प्रतिनिधि माना जाता है, जबकि दुलारचंद यादव ने यादव और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं पर पकड़ बनाई थी। इस टकराव ने न सिर्फ सामाजिक संतुलन को तोड़ा, बल्कि प्रशासन को भी सालों से “दो बंदूकों के बीच फंसा” छोड़ दिया।

चुनाव और गोली की जंग

इस बार मोकामा विधानसभा सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय है-

  • अनंत सिंह (जेडीयू)

  • वीणा देवी (राजद)

  • पीयूष प्रियदर्शी (जन सुराज)

30 अक्टूबर की गोलीबारी के बाद पांच दिन बाद होने वाली वोटिंग अब सन्नाटे के साए में है। हर गली-मोहल्ले में वही सवाल है, क्या इस बार वोट गोली पर भारी पड़ेगा ?

मोकामा की कहानी, बिहार की तस्वीर

मोकामा की हिंसक राजनीति बिहार की उस सच्चाई की तस्वीर है, जहाँ विकास के वादे अक्सर खून से धुल जाते हैं। 1980 के दशक में जब पटना और गया में उद्योग बढ़ रहे थे, तब मोकामा ने बंदूकों से अपना ‘औद्योगिक स्वर’ खो दिया। यहाँ अपराध और राजनीति ने ऐसा गठबंधन बनाया कि कानून और डर एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए।

क्या इस बार मिटेगी खून की लकीर ?

दुलारचंद की हत्या ने पुराने जख्मों को फिर हरा कर दिया है। लोग अब भी उसी सवाल से जूझ रहे हैं-

“क्या मोकामा की मिट्टी कभी लाल होना बंद करेगी ?”

बारूद और बुलेट के बीच यह धरती फिर एक चुनाव का इंतज़ार कर रही है, जहाँ तय होगा कि इस बार वोट की ताक़त गोली की गूंज को मात दे पाएगी या नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!