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बिना रेंट एग्रीमेंट भी मकान मालिक कर सकता है बेदखली: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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ALLAHABAD

किराएदारी कानून 2021 की व्याख्या करते हुए

हाईकोर्ट ने तय किया अहम कानूनी सिद्धांत

NEWS1UP

विशेष संवाददाता

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 (UP Urban Premises Tenancy Regulation Act, 2021) की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कानूनी सिद्धांत स्थापित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं मामलों तक सीमित नहीं है, जहां मकान मालिक और किराएदार के बीच लिखित रेंट एग्रीमेंट मौजूद हो या उसकी जानकारी रेंट अथॉरिटी को दी गई हो

कोर्ट के अनुसार, यदि मकान मालिक और किराएदार के बीच कोई लिखित रेंट एग्रीमेंट नहीं हुआ है या उसकी सूचना रेंट अथॉरिटी को नहीं दी गई है, तब भी मकान मालिक किराएदार की बेदखली के लिए आवेदन करने का अधिकार रखता है।

यह फैसला जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की सिंगल बेंच ने केनरा बैंक ब्रांच ऑफिस व अन्य बनाम मेसर्स टिफको एंड एसोसिएट्स सहित कुल छह याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया। लगभग 47 पन्नों के विस्तृत निर्णय में कोर्ट ने किराएदारी कानून के विभिन्न प्रावधानों का गहन विश्लेषण किया।

क्या था विवाद का मूल मुद्दा ?

हाईकोर्ट के समक्ष सभी जुड़े मामलों में मुख्य सवाल यह था कि-

क्या उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत गठित रेंट अथॉरिटी को ऐसे मामलों में सुनवाई का अधिकार है, जहां न तो कोई लिखित रेंट एग्रीमेंट किया गया है और न ही किराए की जानकारी अथॉरिटी को दी गई है ?

याचिकाकर्ताओं (जिनमें किराएदार भी थे और कुछ मामलों में मकान मालिक भी) का तर्क था कि लिखित रेंट एग्रीमेंट के अभाव में रेंट ट्रिब्यूनल या लघुवाद न्यायालय को सुनवाई का अधिकार ही नहीं बनता। इसी आधार पर उन्होंने बेदखली से जुड़े मामलों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताने की मांग की।

कोर्ट ने क्या कहा ?

हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि-

“2021 के अधिनियम के तहत रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र केवल लिखित एग्रीमेंट और उसकी जानकारी दिए जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विधायिका की मंशा यह होती कि सिर्फ लिखित एग्रीमेंट वाले मामलों में ही रेंट अथॉरिटी के पास जाया जा सके, तो धारा 9 की उपधारा (5) को कानून में शामिल करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि-

  • राज्य विधानमंडल की जानबूझकर की गई चूक (Casus Omissus) के कारण मकान मालिकों को 2021 के अधिनियम के तहत मिले शीघ्र बेदखली के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

  • धारा 4(3) में प्रयुक्त शब्द “Shall” केवल किरायेदारी की जानकारी देने के सीमित उद्देश्य को पूरा करता है।

  • यदि मकान मालिक और किराएदार के रिश्ते को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो केवल “Shall” शब्द के आधार पर अधिकार छीनना कानून की गलत व्याख्या होगी।

याचिकाएं क्यों दाखिल की गई थीं ?

इन सभी मामलों में मकान मालिकों ने रेंट अथॉरिटी, रेंट ट्रिब्यूनल या लघुवाद न्यायालय के समक्ष किराएदारों की बेदखली के लिए आवेदन दायर किए थे। इसके खिलाफ किराएदारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका दावा था कि उनके और मकान मालिक के बीच कोई लिखित रेंट एग्रीमेंट नहीं हुआ, इसलिए संबंधित न्यायिक मंचों को सुनवाई का अधिकार नहीं है।

केनरा बैंक से जुड़े मामले में मकान मालिक की ओर से अमित गुप्ता बनाम गुलाब चंद्र कनेडिया के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें यह सिद्धांत पहले ही स्थापित किया जा चुका है कि रेंट एग्रीमेंट न होने की स्थिति में भी लघुवाद न्यायालय में वाद दाखिल किया जा सकता है

1972 और 2021 के कानूनों का तुलनात्मक विश्लेषण

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाने से पहले उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराए पर देने, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 और उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021, दोनों के विधायी इतिहास पर विस्तार से विचार किया। कोर्ट ने कहा कि 2021 का अधिनियम, केंद्र सरकार के मॉडल टेनेंसी एक्ट से अलग है। जहां मॉडल एक्ट में रेंट एग्रीमेंट की सूचना न देने पर राहत पाने के रास्ते बंद हो जाते हैं, वहीं यूपी के कानून में ऐसा कोई कठोर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

मकान मालिकों को बड़ी राहत

हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि-

“हालांकि कानून में लिखित समझौते का प्रावधान है, लेकिन इसके अभाव में मकान मालिक को उसके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि रेंट एग्रीमेंट ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है, या किरायेदारी की सूचना रेंट अथॉरिटी को नहीं दी गई है, तो भी मकान मालिक केवल इसी आधार पर बेदखली के लिए आवेदन करने से अयोग्य नहीं हो जाता

फैसले का व्यापक प्रभाव

इस फैसले के बाद-

  • बिना लिखित रेंट एग्रीमेंट वाले हजारों मामलों में मकान मालिकों की स्थिति मजबूत होगी।

  • किराएदार अब केवल “एग्रीमेंट नहीं है” कहकर बेदखली प्रक्रिया को टाल नहीं सकेंगे।

  • रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को लेकर चल रहा भ्रम काफी हद तक दूर हो गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उत्तर प्रदेश में किराएदारी कानून की दिशा और दशा तय करने वाला मील का पत्थर साबित होगा और इससे लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी

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