गाजियाबाद में न्याय की कीमत 45 हजार! महिला थाना दारोगा एंटी करप्शन ट्रैप में गिरफ्तार!!
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NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। बात सिर्फ 45 हजार रुपये की रिश्वत की नहीं है। यह उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहाँ पीड़ित को न्याय दिलाने वाला तंत्र खुद सौदेबाज़ बन बैठा है। महिला थाना गाजियाबाद में तैनात दारोगा भुवनेश्वरी सिंह की एंटी करप्शन टीम द्वारा गिरफ्तारी ने पुलिस महकमे के भीतर पनप रहे एक गहरे और खतरनाक चलन को उजागर कर दिया है।
दहेज उत्पीड़न जैसे संवेदनशील अपराध की जांच से नाम हटाने की कीमत 45 हज़ार रुपये तय की गई। और यह सौदा कोई गली-मोहल्ले का दलाल नहीं, बल्कि कानून की वर्दी पहनने वाली एक महिला अधिकारी कर रही थी।

जब ‘एनकाउंटर टीम’ की सदस्य ही कानून तोड़े!
मामले को यह तथ्य और गंभीर बनाता है कि आरोपी दारोगा हाल ही में एक पुलिस एनकाउंटर टीम का हिस्सा भी रह चुकी है। यानी एक ओर ‘अपराध के खिलाफ सख्ती’ की तस्वीर, दूसरी ओर उसी अधिकारी द्वारा कानून का खुला सौदा। यह विरोधाभास बताता है कि सख्त कार्रवाई का प्रदर्शन और व्यक्तिगत नैतिकता, दो अलग-अलग चीज़ें बनती जा रही हैं।
महिला थाना: भरोसे का आख़िरी ठिकाना या दबाव का केंद्र ?
महिला थाने की भूमिका महज एफआईआर लिखने की नहीं होती, वह पीड़ित महिलाओं के लिए आख़िरी सहारा होता है। लेकिन जब वही थाना नाम जोड़ने या हटाने की मोलभाव की जगह बन जाए तथा दहेज कानून डर और वसूली का हथियार बन जाए, तो सवाल केवल एक दारोगा का नहीं बल्कि पूरी प्रणाली का बन जाता है।
गाजियाबाद: ‘रंगे हाथ’ पकड़े जाने का जिला ?
बीते समय में गाजियाबाद में लगातार पुलिसकर्मियों के रिश्वत लेते पकड़े जाने की घटनाएं सामने आई हैं। कहीं दहेज केस में नाम हटाने की कीमत, कहीं ज़मीन विवाद में ‘सुविधा शुल्क’ तो कहीं जमानत के बदले लाखों की मांग। यह सिलसिला बताता है कि एंटी करप्शन की कार्रवाई अपवाद नहीं, बल्कि ज़रूरत बन चुकी है।
बीते एक–डेढ़ साल में गाजियाबाद में पुलिसकर्मियों के रिश्वत लेते पकड़े जाने की प्रमुख घटनाएं!
महिला दारोगा और हेड कांस्टेबल को दहेज मामले में नाम हटाने के लिए 50,000 रुपए लेते गिरफ्तार किया गया।
कलछीना चौकी इंचार्ज को भूमि विवाद में 50,000 रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया।
क्राइम ब्रांच इंस्पेक्टर पर आरोपी को राहत दिलाने के बदले 4 लाख रुपए लेने का आरोप लगा और गिरफ्तारी हुई।
अंकुर विहार थाने के एसएसआई 20,000 रुपए लेते रंगे हाथ पकड़े गए।
भोजपुर थाने के दो दारोगाओं पर 2 लाख रुपए रिश्वत मांगने का मामला दर्ज हुआ।
डर किसे है ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कुछ पुलिसकर्मी यह मान चुके हैं कि पकड़े जाने का जोखिम भी फायदे से छोटा है ? क्या सस्पेंशन और मुकदमे अब रोक नहीं, औपचारिकता बनते जा रहे हैं ? और क्या संवेदनशील कानूनों पर काम करने वाले अधिकारियों की विशेष निगरानी की कोई व्यवस्था है ?
एंटी करप्शन की कार्रवाई: इलाज या सिर्फ़ मरहम ?
मेरठ की एंटी करप्शन टीम की यह कार्रवाई काबिले-तारीफ है, लेकिन यह भी साफ है कि जब तक सिस्टम के भीतर निरंतर निगरानी, रोटेशन और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। भ्रष्ट अधिकारीयों का तमाम विभागों में पकडे जाना, बर्खास्त हो जाना और इन ख़बरों का सुर्खियां बन जाना अब केवल उतना ही महत्त्व रखता है जितना कि एक छोटे बच्चे को यह कहकर डराना कि बाहर जाओगे तो बाबाजी पकड़ लेगा। क्योंकि तमाम धरपकड़ और सतर्कता के बाबजूद रिश्वतखोरी, लोगों को बेबजह फंसा देना, यहाँ तलक कि उन्हें मरने तक को मजबूर कर देना, इन हरकतों से कोई एंटी करप्शन किसी अधिकारी को नहीं डरा पा रहा है।
भुवनेश्वरी सिंह की गिरफ्तारी एक व्यक्ति की गिरफ़्तारी नहीं है, यह वर्दी, कानून और भरोसे के रिश्ते पर लगा एक और दाग है। अब सवाल यह नहीं कि “कौन पकड़ा गया”, सवाल यह है कि कितने अब भी बचे हैं, और कब तक ??
