आखिर क्यों लगा है दिल्ली की दिवाली पर ग्रहण ??
देश एकजुट ‘हम नहीं डरेंगे’ की गूंज
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
नई दिल्ली। दिवाली के ठीक बाद राजधानी दिल्ली फिर एक बार दहल उठी। सोमवार रात लाल क़िला मेट्रो स्टेशन के बाहर एक मूविंग कार में तेज़ धमाका हुआ, जिसने कुछ ही पलों में पूरे इलाके को अफरातफरी में बदल दिया। धमाके की तीव्रता इतनी ज़्यादा थी कि आसपास खड़ी कई गाड़ियाँ जल उठीं और कई राहगीर इसकी चपेट में आ गए। बम ब्लास्ट 10 लोगों की मौत और कई के घायल होने की पुष्टि हुई है।
घटना की सूचना मिलते ही एनएसजी, एनआईए, दिल्ली पुलिस, फॉरेंसिक टीमें और तमाम एजेंसियाँ मौके पर पहुँच गईं। इलाके को पूरी तरह सील कर दिया गया है। यह खबर लिखे जाने तक किसी आतंकी संगठन ने इस ब्लास्ट की जिम्मेदारी नहीं ली है। लेकिन घटना ने दिल्लीवासियों के ज़ेहन में एक बार फिर पुराने ज़ख्म कुरेद दिए हैं, 2005 और 2008 के सीरियल ब्लास्ट्स की भयावह यादें।
29 अक्टूबर 2005: दिवाली से पहले दहली थी दिल्ली

दिवाली का त्योहार खुशियों का प्रतीक होता है, लेकिन 2005 में इसी उत्सव से पहले राजधानी मातम में डूब गई थी। शाम के वक्त पहाड़गंज, गोविंदपुरी और सरोजिनी नगर में एक के बाद एक तीन ब्लास्ट हुए थे।
पहला धमाका पहाड़गंज मार्केट में हुआ, जहाँ सड़कों पर लोगों की भीड़ थी। कुछ ही देर बाद गोविंदपुरी में डीटीसी बस के भीतर दूसरा ब्लास्ट हुआ। ड्राइवर की सूझबूझ से वह बैग बस से बाहर फेंक दिया गया, वरना मौत का आंकड़ा कहीं बड़ा होता। तीसरा और सबसे घातक धमाका सरोजिनी नगर मार्केट में हुआ, जहाँ 50 से ज़्यादा लोग मौके पर ही मारे गए।
इन सीरियल बम धमाकों में 60 से ज़्यादा लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हुए थे। जिसकी ज़िम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा ने ली थी।
13 सितंबर 2008: जब दिल्ली फिर बम धमाकों से दहली

2005 के तीन साल बाद दिल्ली ने एक बार फिर वही खौफनाक मंज़र देखा। शाम का वक्त था, और राजधानी के दिल में, कनॉट प्लेस, करोलबाग, मेट्रो स्टेशन, ग्रेटर कैलाश और बाराखंभा रोड, में लगातार पाँच धमाके हुए। धमाकों से पहले दिल्ली पुलिस को एक ईमेल मिला था, जिसमें लिखा था, “पाँच मिनट बाद दिल्ली में तबाही मचने वाली है।” लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। इन धमाकों में 25 लोगों की मौत और करीब 100 घायल हुए थे। इस बार जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी।
लाल क़िला ब्लास्ट: फिर लौट आया डर का साया!

लाल क़िला मेट्रो स्टेशन के बाहर हुआ ये धमाका भले ही अबतक रहस्य बना हुआ है, लेकिन राजधानी के लोगों के मन में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता फिर से जाग उठी है। घटना का स्थान, लाल क़िला, देश की अस्मिता का प्रतीक, इस वारदात को और भी गंभीर बना देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के बीच सुरक्षा व्यवस्था की सबसे अधिक ज़रूरत होती है। राजधानी में हर कोना, हर भीड़भाड़ वाला इलाका, संवेदनशील होता है।
दिल्ली डटी थी, दिल्ली डटी रहेगी
2005 हो या 2008, दिल्ली ने तबाही देखी, आँसू देखे, पर हारी नहीं। आज फिर हालात कठिन हैं, लेकिन दिल्ली का जज़्बा वही है। देश की एजेंसियाँ हर दिशा में जांच कर रही हैं, सुराग तलाशे जा रहे हैं। दिल्ली फिर एक बार डर और दहशत के साए में है, लेकिन इस शहर की रगों में हिम्मत और उम्मीद आज भी ज़िंदा है।
“दिल्ली रोई भी है… और लड़ी भी है”
इस बार भी वो झुकेगी नहीं, बल्कि फिर से खड़ी होगी, मज़बूती के साथ
