नाती-नातिन को नाना की संपत्ति पर ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ नहीं!

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बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

जन्म से अधिकार” सिर्फ़ पितृ-वंशीय संपत्ति में, मातृ-पक्ष में नहीं

NEWS1UP

मुंबई। पारिवारिक संपत्ति को लेकर चल रहे विवादों के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने हिंदू उत्तराधिकार कानून की सीमाओं को एक बार फिर से स्पष्ट कर दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि किसी हिंदू परिवार में नाती या नातिन को अपने नाना की संपत्ति पर ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ नहीं होता।

यह फैसला ऑरंगाबाद बेंच के न्यायमूर्ति आर. जी. अवचट और न्यायमूर्ति एस. जी. चपल्गावकर ने विश्‍वम्भर नामदेव निकम बनाम सौ. सुनंदा निकम एवं अन्य मामले में सुनाया। अदालत ने कहा कि मातृ पक्ष (माँ की ओर से मिलने वाली संपत्ति) को “कोपार्सेनरी” या “वंशानुगत जन्मसिद्ध अधिकार” वाली संपत्ति नहीं माना जा सकता।

 न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि

“हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ केवल उस संपत्ति में होता है जो पिता या पितृ-वंश से उतरती है। नाना या मातृ-पक्ष से मिली संपत्ति में ऐसा कोई अधिकार नहीं माना जा सकता।”

इस मामले में एक नातिन ने यह दावा किया था कि उसके नाना की संपत्ति में उसका जन्मसिद्ध हिस्सा है, लेकिन अदालत ने इस तर्क को “कानूनी रूप से अस्थिर और भ्रामक” (illusory cause of action) बताया।

 2005 का संशोधन और ‘कोपार्सेनरी अधिकार

साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में बड़ा संशोधन किया गया था। इस संशोधन के बाद बेटियों को भी बेटों के बराबर “कोपार्सेनरी अधिकार” मिला, यानी पिता की संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में जन्म से ही बराबर का हिस्सामगर, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार सिर्फ़ पितृ पक्ष की संपत्ति में लागू होता है, मातृ पक्ष की संपत्ति में नहीं। इसलिए “नाती या नातिन” को नाना की संपत्ति में ऐसा जन्मसिद्ध हक नहीं कहा जा सकता।

 कोर्ट का तर्क:  संपत्ति की “लाइन” से तय होता है अधिकार

न्यायालय ने कहा कि-

  • “हिंदू कानून में ‘अवरोध-रहित संपत्ति’ (unobstructed heritage)” केवल पितृ वंशीय लाइन में मानी जाती है।

  • जबकि “मातृ वंशीय संपत्ति” को “अवरोधित उत्तराधिकार” (obstructed heritage) कहा जाता है, जहाँ अधिकार तब ही मिलता है जब बीच की पीढ़ी (यानी माँ या पिता) का निधन हो जाता है।

इसलिए जब तक माता या पिता जीवित हैं, नाती-नातिन को किसी भी रूप में नाना की संपत्ति पर अधिकार नहीं हो सकता।

 विशेषज्ञों की राय:

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले वर्षों में संपत्ति विवादों को सीमित करने वाला साबित होगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पाटिल कहते हैं_

“बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि नाती या नातिन को नाना की संपत्ति में स्वतः हिस्सा मिलेगा। यह गलतफहमी अब खत्म होनी चाहिए। यह फैसला बताता है कि जन्मसिद्ध अधिकार की परिभाषा सीमित और स्पष्ट है।”

 पारिवारिक समझ में बदलाव की ज़रूरत

यह फैसला सिर्फ़ कानून का नहीं, बल्कि सामाजिक समझ का भी आईना है। भारत में परिवारों में अक्सर यह मान लिया जाता है कि हर रक्त संबंध संपत्ति में हिस्सा देगा, जबकि असल में ऐसा नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब परिवारों को अपनी वसीयत, दान और उत्तराधिकार के दस्तावेज़ स्पष्ट रखने चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न हों।

 फैसले के प्रमुख बिंदु

नाती-नातिन को नाना की संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार नहीं

“कोपार्सेनरी” हक केवल पितृ पक्षीय संपत्ति में लागू।

मातृ पक्ष की संपत्ति “अवरोधित उत्तराधिकार” मानी जाएगी।

यदि माता या पिता जीवित हैं, तो उनके रहते हुए नाती-नातिन कोई दावा नहीं कर सकते।

यह फैसला संपत्ति विवादों में स्पष्ट कानूनी दिशा देता है।

 बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय पारिवारिक कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। यह न केवल उत्तराधिकार के कानूनी ढाँचे को स्पष्ट करता है, बल्कि परिवारों को यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि “रिश्ता” और “कानूनी हक”  दोनों हमेशा समान नहीं होते। आने वाले समय में यह फैसला कई पारिवारिक विवादों को दिशा देगा और संभव है कि सुप्रीम कोर्ट में भी यह विषय एक बार फिर विस्तार से सुना जाए।

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