February 9, 2026
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एक गॉंव, एक कहानी, दो पहलू
मगर पीड़ा एक

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

दादरी। नवंबर की हल्की ठंड ने दादरी के बिसाहड़ा गांव की सुबह को नर्म कर दिया है। लेकिन इस नरमी के बीच भी एक खिंची हुई-सी बेचैनी हवा में घुली है। गांव की गलियों से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे हर ईंट, हर मोड़, हर दरवाज़ा एक अनकही कहानी अपने भीतर छुपाए बैठा है। यह वही गांव है जिसने दस साल पहले 28 सितंबर 2015 की रात इंसानियत को झकझोर देने वाला अख़लाक़ कांड देखा और उसी रात से गांव का दिल जैसे थोड़ा दरक-सा गया।

आज, एक दशक बाद, जब अदालत में मुकदमा वापस लेने पर सुनवाई की घड़ी करीब आ रही है, गांव फिर उसी रात की तरफ़ लौटता दिखता है। हालाँकि इस बार सवालों और आरोपों के बीच नहीं, बल्कि शांति और साझा दर्द की तरफ़ झुकता हुआ।

गांव की सांसों में अब भी वह रात तैरती है

बिसाहड़ा का रास्ता खेतों के बीच से निकलता है। उसी रास्ते पर चलते हुए एक बुजुर्ग अचानक धीमी आवाज़ में कहते हैं, “गांव का दिल उस रात फट गया था बेटा। हम सबने अपने भीतर कुछ खो दिया था।” उनके चेहरे की झुर्रियों में वर्षों का दर्द और समझदारी दोनों एक साथ दिखाई देते हैं। गांव की पीढ़ियों के बीच उस रात की चर्चा आज भी फुसफुसाहटों में मौजूद है, कभी एक आह बनकर, कभी एक लंबी चुप्पी बनकर।

एच.के. शर्मा: पुल बनने की कोशिश की एक कहानी

सामाजिक चिंतक, एच. के शर्मा

क्षेत्र के वरिष्ठ सामाजिक चिंतक एच.के. शर्मा उस रात की यादों को ऐसे सहेजकर रखते हैं जैसे किसी पवित्र घाव को बार-बार छूने से बचाते हों।
वे बेहद धीमी आवाज़ में कहते हैं-

“उस रात जो हुआ.. वह केवल अख़लाक़ का नहीं, पूरे गांव का दर्द था।”

घटना के बाद एच. के. शर्मा ने गांव के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने की पहल की। उन्होंने अख़लाक़ के परिवार की मदद की हर संभव कोशिश की। गॉंव की दो मुस्लिम बेटियों की शादी अपने सहयोग से कराई, और पूरे गांव ने मदद की। वह बताते हैं कि उन शादियों में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों ने मिलकर भोजन परोसा, सजावट की, और बरात का स्वागत किया। वह आगे बोले, “हमारे गांव की यही पहचान थी, और है भी। घटना ने हमें तोड़ा, लेकिन हमने फिर जोड़ने की कोशिश की।” उनके शब्दों में न कोई राजनीति है, न कोई आरोप, केवल एक गांव की टूटन और उसे जोड़ने का मन।

पीड़ित परिवार का पक्ष: दर्द अब भी ताज़ा

अधिवक्ता युसूफ सैफी

गांव की भीड़-भाड़ से दूर, अख़लाक़ परिवार आज भी अपने जख्मों को चुपचाप ढोता है। परिवार के वकील यूसुफ़ सैफ़ी उनके दर्द को आवाज़ देते हैं।
वे कहते हैं-

“अख़लाक़ की मौत सिर्फ़ एक हत्या नहीं थी, यह मॉब लिंचिंग थी। दस साल बाद भी परिवार हर बार सुनवाई की तारीख पर वही सब जीता है।”

सैफ़ी इस बात से भी खिन्न हैं कि सरकार ने दोनों पक्षों को साथ बैठाकर बात कराने की कोई पहल नहीं की। सैफ़ी कहते हैं कि अगर सरकार सचमुच चाहती कि समाज में सकारात्मक संदेश जाए, तो पहले बातचीत कराती, फिर मुकदमा वापसी की सोचती। उनके शब्दों में कानून की भाषा के बजाए दुख का भाव ज्यादा है।

बिसाहड़ा के दो छोर: आवाज़ें अलग, तकलीफ़ एक

गांव में चलते हुए अक्सर लोगों की बातें आधे में ही रुक जाती हैं। कभी कोई अचानक चुप हो जाता है, कभी कोई सिर्फ़ इतना कहता है, “जो होना था वो हो गया… अब बस एकता और प्रगति चाहिए।” गांव के बच्चों से पूछो तो उन्हें घटना का पूरा इतिहास नहीं पता, लेकिन वे जानते हैं कि “उस रात कुछ बुरा हुआ था।” और यही बात गांव की नई पीढ़ी के लिए बोझ भी है और उम्मीद भी, वे अपनी जिंदगी किसी पुरानी त्रासदी की छाया में नहीं देखना चाहते।

गॉंव के युवा कवि पंकज राणा कहते हैं कि –

युवा कवि पंकज राणा


“हमारी दोस्तियां धर्म नहीं देखतीं। ये मामला बस खत्म हो जाए, गांव सामान्य हो जाए… हम  यही चाहते हैं।”

12 दिसंबर: उम्मीद, डर और इंतज़ार का संगम

गांव में हर कोई तारीख़ याद रखे बैठा है। 12 दिसंबरकिसी के लिए यह उम्मीद का दिन है, किसी के लिए डर का, किसी के लिए बस एक और कोर्ट की तारीख़। लेकिन यह तारीख़ गांव के इतिहास में एक और मोड़ जोड़ सकती है। मुकदमा वापस लिया जाएगा या नहीं, यह अदालत तय करेगी। पर गांव चाहता है कि जो भी हो, शांति की राह न टूटे।

 टूटे दिलों को जोड़ने की कोशिश

दस साल बाद भी बिसाहड़ा किसी पक्ष में खड़ा नहीं दिखता। गांव बस अपने पुराने दिनों की ओर लौटना चाहता है, जहां मोहब्बत थी, साझा तीज-त्योहार थे, और गलियों में डर नहीं, उजाला था। अख़लाक़ कांड ने यहां सिर्फ़ एक आदमी नहीं छीना, गांव की मासूमियत भी छीन ली। लेकिन उम्मीद छोटी-सी लौ की तरह अब भी जल रही है और इंसानी इतिहास गवाह है कि उम्मीद की हर लौ में हमेशा समाज को सदभावना, सदभाव और भाईचारे की गरमी दी है। 

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