वंदे मातरम के 150 साल : एक गीत जिसने ‘भारत की आत्मा को’ आवाज़ दी!
वंदे मातरम नारा नहीं, भारत की आत्मा है

NEWS1UP
भूमेश शर्मा
आज से ठीक डेढ़ सदी पहले, 7 नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वह गीत लिखा था, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा को स्वर दिया “वंदे मातरम।” यह केवल एक कविता नहीं थी, बल्कि एक ऐसी पुकार थी, जिसने करोड़ों भारतीयों के हृदय में मातृभूमि के लिए प्रेम और त्याग की ज्वाला प्रज्वलित कर दी।
‘वंदे मातरम’ शब्दों में वह भाव था जो किसी भी सीमा या काल से परे था। सबसे पहले इसका प्रकाशन नवंबर 1875 में बंगाली पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में हुआ। सात वर्ष बाद, 1882 में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में स्थान दिया। यह वही उपन्यास था जिसमें संन्यासियों का एक समूह भारत माता की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व त्याग देता है। मातृभूमि को देवी के रूप में पूजने की इस भावना ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की चेतना को जन्म दिया।
फिर आया 1896 का कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन। रवींद्रनाथ टैगोर ने जब पहली बार “वंदे मातरम” को अपनी स्वर लहरियों में ढाला, तो सभागार में सन्नाटा छा गया। यह अब केवल साहित्य नहीं रहा, यह भारत की आत्मा की गूंज थी। इस गीत ने लोगों को यह एहसास कराया कि स्वतंत्रता केवल सपना नहीं, बल्कि कर्तव्य है।
1905 में जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया, तो उसी वर्ष 7 अगस्त को कोलकाता टाउन हॉल से शुरू हुआ आंदोलन “वंदे मातरम” के नारों से गूंज उठा। यह गीत अब विद्रोह का स्वर बन चुका था। ब्रिटिश हुकूमत भयभीत थी। स्कूलों और कॉलेजों में इसे गाने पर पाबंदी लगा दी गई। रंगपुर के स्कूल में जब 200 छात्रों ने इसे गाया तो उन पर पाँच-पाँच रुपये का जुर्माना लगाया गया। पर छात्रों ने कहा “जुर्माना लगे तो लगे, पर वंदे मातरम जरूर गाएंगे।” यही वह क्षण था जब यह गीत आंदोलन की आत्मा बन गया।

1907 में भारत से हजारों मील दूर जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में, ने भारतीय तिरंगा झंडा फहराया, जिस पर लिखा था “वंदे मातरम।” यह झंडा भारत की अस्मिता का प्रतीक था, जिसने दुनिया को बताया कि गुलाम भारत अब जाग उठा है। उसी वर्ष श्री अरबिंदो घोष ने अंग्रेज़ी अखबार Vande Mataram में लिखा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने यह गीत 32 साल पहले रचा था। यह लेख इस गीत की ऐतिहासिक विरासत का प्रमाण बना।
1906 में बारीसाल (अब बांग्लादेश) में एक विशाल जुलूस में दस हज़ार से अधिक लोग, हिंदू और मुसलमान दोनों वंदे मातरम के झंडे थामे सड़कों पर निकले। यह गीत अब केवल राष्ट्र नहीं, बल्कि एकता की आवाज़ बन गया था। अंग्रेजों ने इस पर रोक लगाई, पर इसकी गूंज हर दिल में बस चुकी थी।

बिपिन चंद्र पाल और श्री अरबिंदो घोष ने ‘वंदे मातरम’ नाम से एक अखबार निकाला, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ वैचारिक क्रांति का औजार बना। कोलकाता, लाहौर, रावलपिंडी, धुलिया हर जगह आंदोलनकारियों की आवाज़ में यही स्वर था “वंदे मातरम।” लोकमान्य तिलक को जब मांडले जेल भेजा गया, तो भीड़ ने यही गीत गाया। पुलिस की लाठियों और गोलियों के बीच भी यह गीत दबा नहीं, बल्कि और ऊँचा उठता गया।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में यह गीत हर रैली, हर प्रभात फेरी, हर जेल यात्रा का हिस्सा था। यह लोगों के साहस का, उनके आत्मबल का और उनकी एकजुटता का प्रतीक बन गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। यह वह क्षण था जब स्वतंत्र भारत ने अपनी आत्मा की आवाज़ को औपचारिक सम्मान दिया।
आज, 150 साल बाद भी जब यह गीत गूंजता है, तो हर भारतीय के भीतर वही जोश, वही श्रद्धा और वही गर्व जाग उठता है। वंदे मातरम की यह यात्रा केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक अनंत प्रेरणा है, जो हमें याद दिलाती है कि देशभक्ति कभी पुरानी नहीं होती, वह हर पीढ़ी के खून में बहती है।
जब कोई बच्चा स्कूल में “वंदे मातरम” कहता है, जब कोई सैनिक सीमा पर इसे गुनगुनाता है, या जब कोई नागरिक इसे सुनकर सिर झुका देता है, तो उसमें केवल गीत नहीं, बल्कि 150 वर्षों की बलिदान, संघर्ष और एकता की गूंज होती है।
वंदे मातरम!
सुजलां सुफलां मलयज शीतलां,
शस्य श्यामलां मातरम।
वंदे मातरम नारा नहीं, भारत की आत्मा है।

