गाजियाबाद। के हापुड़ चुंगी चौराहे पर बना फुट ओवर ब्रिज (FOB) अपने उद्देश्य के ठीक उलट खड़ा दिखाई देता है। जिस पुल को लोगों की जान बचाने के लिए बनाया गया था, वही आज मौत की ओर ले जाने वाली सीढ़ियों में तब्दील हो चुका है। शास्त्रीनगर की ओर उतरते ही सीढ़ियाँ किसी सुरक्षित फुटपाथ पर नहीं, बल्कि सीधे एक गहरे और चौड़े खुले नाले के मुहाने पर खत्म होती हैं। नीचे बस एक तीन फीट की जर्जर पटिया, जो सुरक्षा नहीं, सिस्टम की असंवेदनशीलता का प्रतीक है।
यह महज़ लापरवाही का मामला नहीं है। यह सवाल उस पूरी प्रक्रिया पर है, ड्राइंग से लेकर स्वीकृति तक। आखिर किस इंजीनियर ने ऐसी ड्राइंग बनाई ? और किस अफसर ने आंख मूंदकर उस पर मुहर लगा दी ? क्या किसी ने मौके पर जाकर देखा कि आम आदमी इस पुल से उतरेगा कैसे ? या फिर काग़ज़ों में ही ‘विकास’ पूरा मान लिया गया ?
हापुड़ चुंगी चौराहे पर बना फुट ओवर ब्रिज
इसी तरह राजनगर एक्सटेंशन में, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने पुलिस चौकी से क्लासिक रेजिडेंसी सोसायटी तक बनी नई सड़क भी एक और खतरनाक उदाहरण है। सड़क और पाँच फीट गहरी खुली नाली के बीच महज़ दो फीट का फासला। न स्ट्रीटलाइट, न चेतावनी संकेत। अंधेरे में यह रास्ता इंसानों, पशुओं और वाहनों, तीनों के लिए जानलेवा साबित हो चुका है। कई गिर चुके हैं, कई बाल-बाल बचे हैं। सवाल यह है कि अगला शिकार कौन ?
राजनगर एक्सटेंशन की सड़क
नोएडा में युवा इंजीनियर युवराज की दर्दनाक मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने त्वरित कार्रवाई करते हुए नोएडा के सीईओ को हटाया, यह कदम जरूरी था। लेकिन क्या यह पर्याप्त है ? क्या एक कुर्सी बदलने से वह सिस्टम बदल जाएगा, जिसकी मोटी चमड़ी पर आम नागरिक की चीखें भी असर नहीं करतीं ?
सच यह है कि नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों में भ्रष्टाचार, लापरवाही और जवाबदेही की कमी एक गहरी बीमारी बन चुकी है। शिकायतें आती हैं, फाइलें चलती हैं, नोटिस जारी होते हैं, और फिर सब ठंडे बस्ते में। ज़मीन पर हालात जस के तस रहते हैं, जब तक कोई बड़ा हादसा सुर्खियां न बन जाए।
मुख्यमंत्री महोदय, युवराज की मौत केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, यह पूरे सिस्टम पर आरोप पत्र है। एक सीईओ को हटाना शुरुआत हो सकती है, समाधान नहीं। ज़रूरत है एक व्यापक, निष्पक्ष और सार्वजनिक समीक्षा की, कि विकास के नाम पर बने हर पुल, हर सड़क, हर नाली की जवाबदेही तय हो। शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, किन अफसरों ने आंखें मूंदी, किन ठेकेदारों ने मानकों से समझौता किया, सब कुछ सामने आए।
क्योंकि जब तक मौत की सीढ़ियाँ यूँ ही बनती रहेंगी, तब तक हर नागरिक संभावित युवराज है। और तब सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं रहेगा, सिस्टम की संवेदनहीनता का होगा, जो विकास की आड़ में जानें लील रहा है।