गौर कैस्केड्स: एओए सत्ता के वर्चस्व में उलझी, विवादों का नया केंद्र बनी सोसायटी!

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एओए सचिव पर हमले के बाद  सोसायटी दो धड़ों में बंटी

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। शहर के राजनगर एक्सटेंशन की नामी और पहले शांत मानी जाने वाली हाउसिंग सोसाइटी गौर कैस्केड्स इन दिनों उथल-पुथल और तनाव के दौर से गुजर रही है। जिस सोसाइटी को बेहतर जीवन और सुरक्षित आवास का प्रतीक समझा जाता था, वह अब एओए (Apartment Owners Association) की वर्चस्व की लड़ाई, जातिगत वैमनस्य, आपसी टकराव और पुलिस केस का अखाड़ा बन चुकी है। सोसायटी में पहले ही ऐसे कई मुद्दे रेसिडेंट्स के लिए चुनौती बनकर खड़े हुए हैं जो बिल्डर की और प्रशासन की मिलीभगत को उजागर कर रहे हैं, उस पर आपसी मनमुटाव ने सोसायटी के सामने एक नयी समस्या पैदा कर दी है।

पुनीत गोयल

हमला जिसने माहौल को गरमा दिया

5 अक्टूबर को सोसाइटी के मौजूदा एओए सचिव पुनीत गोयल पर हुए कथित हमले ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। इस हमले का आरोप वरिष्ठ नागरिक रमेश राठी पर लगा है। पुलिस में एफआईआर दर्ज हो चुकी है और मामले की तफ्तीश जारी है। पुनीत गोयल का दावा है कि रमेश राठी इस हमले का सिर्फ मोहरा हैं, असल साजिश उनके ही बोर्ड के एक सदस्य की है, जो कई सालों से सोसायटी की कार्यकारिणी में सक्रिय रहे हैं।
पुनीत गोयल ने आरोप लगाया कि वे पिछले कई  एओए कार्यकाल के वित्तीय घोटालों और बिल्डर से मिलीभगत को उजागर कर रहे थे। इसी वजह से उन पर जानलेवा हमला करवाया गया ताकि वे डर जाएं और चुप हो जाएं।

 

 आरोपों के जवाब में आरोप

जहां पुनीत गोयल अपने ऊपर हुए हमले को भ्रष्टाचार से जोड़ रहे हैं, वहीं रमेश राठी ने इसे अपने विरुद्ध साज़िश बताया है। उनके मुताबिक वो पुनीत गोयल से सोसायटी के कुछ लंबित कार्यों पर बात कर रहे थे बातों-बातों में पुनीत उन्हें उकसा रहे थे। और फिर मामला हाथापाई तक जा पंहुचा। वर्तमान बोर्ड के चार मेंबर्स ने अपने प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी पर मनमानी के आरोप लगाते हुए डिप्टी रजिस्ट्रार से लिखित शिकायत की हुई है!

इनका मामला अब डिप्टी रजिस्ट्रार के समक्ष लंबित है। सवाल यह है कि जब शिकायत पहले ही नियमानुसार रजिस्ट्रार को भेज दी गई थी, तो फिर हिंसा जैसी हरकत की ज़रूरत क्यों पड़ी? यही सवाल अब सोसायटी के हर जिम्मेदार निवासी के मन में है।

 

हमले के विरोध मार्च में शामिल रेसिडेंट्स

प्रदर्शन बनाम प्रदर्शन: सोसाइटी दो धड़ों में बंटी

हमले के विरोध में सोसायटी के बड़ी संख्या में रेसिडेंट्स ने एकजुट होकर शांति मार्च निकाला। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इसके जवाब में आरोपी पक्ष ने भी ताकत दिखाने के लिए अपना प्रदर्शन आयोजित किया। इससे साफ है कि सोसायटी अब दो हिस्सों में साफ तौर पर बंट चुकी है, एक पक्ष पुनीत गोयल के साथ है तो दूसरा उनके विरोध में।

जाति की राजनीति: एक खतरनाक मोड़

इस मामले ने और खतरनाक रूप तब लिया जब इसमें जातिगत रंगत घुल गई। पुनीत गोयल ने आरोप लगाया कि हमलावर और उनके समर्थक एक विशेष जाति के हैं और सोसायटी में उसी जाति का वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। ये आरोप बेहद गंभीर हैं क्योंकि ये केवल एक सोसायटी तक सीमित नहीं, बल्कि उस बढ़ती हुई सामाजिक दरार की ओर इशारा करते हैं जो अब हाउसिंग सोसायटियों तक को निगल रही है।

बिल्डर: इस जहर का मूल स्रोत?

इस घटनाक्रम में जिस बात को लेकर विशेषज्ञ सबसे ज़्यादा चिंतित हैं, वह है इस तरह की उथल-पुथल में बिल्डर की भूमिका। कई सोसायटियों में यह देखा गया है कि जब बिल्डर सोसायटी को निवासियों को हैंडओवर करता है, तभी वह चालाकी से दो गुट बना देता है,  समर्थक और विरोधी। और फिर अपनी अधूरी जिम्मेदारियों से बचने के लिए ‘बाँटो और राज करो’ की नीति अपनाता है। गौड़ कैस्केड्स में भी अब यही नीति साफ दिखाई दे रही है।
अधूरी सुविधाएं, अधूरा हैंडओवर, और फिर जवाबदेही से बचने की कोशिशें,  इन सबके बीच सोसायटी के निवासी धीरे-धीरे आपसी झगड़ों और जातिगत नफरत में उलझते चले जाते हैं, और असली दोषी, बिल्डर साफ बच निकलता है।

सोशल मीडिया ग्रुप्स: नफरत का नया अड्डा

आजकल ईमेल, व्हाट्सएप, टेलीग्राम और फेसबुक ग्रुप्स सोसायटी निवासियों के संवाद का ज़रिया होते हैं। लेकिन सोसायटियों में अब ये ग्रुप्स संगठित होकर बदनाम करने और जातिगत टिप्पणियों का अड्डा बन चुके हैं। कुछ ग्रुप्स में चुनिंदा लोगों को टारगेट कर गाली-गलौच, फर्जी आरोप, और अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती हैं, जिससे सोसायटी का सामाजिक सौहार्द लगातार बिगड़ रहा है।

 पुलिस की भूमिका

इस पूरे मामले में स्थानीय पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अगर समय रहते एओए की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होती, तो शायद हालात इतने ना बिगड़ते।

नंदग्राम एसीपी उपासना पांडे का कहना है कि,

“हाई राइज सोसायटियों में आये दिन छोटे-छोटे झगड़े सामने आते रहते हैं। असल मुद्दों से अलग, ईगो का टकराव कहीं ज्यादा है। गौड़ कैस्केड्स के मामले में पुलिस विस्तार से जांच कर रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

उन्होंने आगे कहा कि पुलिस की कोशिश है कि किसी भी निवासी को असुरक्षा का एहसास न हो और सभी मामलों में कानून के तहत निष्पक्ष कार्रवाई की जाए। सोसायटी ईमेल और व्हाट्सप्प ग्रुप्स पर निगरानी है और भड़काऊ कंटेंट पर कड़ी कार्रवाई  की जाएगी।

एओए प्रेसिडेंट नरेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि पिछले बोर्ड के कार्यकाल की तह में जाने के चलते सेक्रेटरी पुनीत गोयल पर यह हमला हुआ है। पिछले बोर्ड और बिल्डर की मिलीभगत उजागर न हो इसलिए यह डराने की कोशिश है, परन्तु रेसिडेंट्स अपने अधिकार और सम्मान के लिए एकजुट हैं।

नरेंद्र सिंह चौहान

 

समाधान नहीं हुआ तो संकट गहराएगा

गौर कैस्केड्स में जो कुछ हो रहा है, वह एक बडी चेतावनी है, न सिर्फ गाजियाबाद के लिए, बल्कि उन हजारों हाउसिंग सोसायटियों के लिए, जहां आज भी बिल्डर की पकड़ मजबूत है और निवासी आपस में बंटे हुए हैं।
यदि समय रहते एओए की पारदर्शिता, बिल्डर की जवाबदेही, और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ये झगड़े सिर्फ एक सोसायटी तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे शहरी समाज को अंदर से खोखला कर देंगे।
यह सिर्फ एओए की लड़ाई नहीं है, यह समाज के चरित्र की परीक्षा है।

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