GDA की एफआईआर ने खोली कई सोसायटियों की बंद फाइलें!!
देविका स्काइपर्स से उठता सवाल
कब मिलेंगे होम बायर्स को उनके हक़ ?
NEWS1UP
विशेष संवाददाता
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित देविका स्काइपर्स सोसायटी का मामला एक बार फिर गाजियाबाद की हाउसिंग सोसायटियों में बिल्डर–बायर्स विवाद को सुर्खियों में ले आया है। इंटरेस्ट फ्री मेंटेनेंस सिक्योरिटी की धनराशि (IFMS) अपार्टमेंट ओनर्स को ट्रांसफर न करने और अधूरे निर्माण कार्यों को लेकर गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) ने सख्त रुख अपनाते हुए सोसायटी के बिल्डर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है।
नंदग्राम थाने में दर्ज इस मामले में जीडीए के अवर अभियंता इम्तियाज अहमद खां की शिकायत पर शोभित फाइनेंस के निदेशक अंकित अग्रवाल और दिनकर गिरी को नामजद किया गया है। आरोप है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के नवंबर 2023 के स्पष्ट आदेशों और उसके बाद 22 मई 2024 को जीडीए द्वारा जारी निर्देशों के बावजूद बिल्डर ने न तो अधूरे निर्माण पूरे किए और न ही IFMS की राशि तय समय में फ्लैट मालिकों को सौंपी।
हाईकोर्ट के आदेश, फिर भी टालमटोल
हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस जमा धनराशि और अधूरे निर्माण को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। इसके तहत जीडीए ने बिल्डर को तीन माह में अधूरे काम पूरे करने और दो माह के भीतर IFMS एओए को ट्रांसफर करने को कहा था। लेकिन एक साल से अधिक समय बीतने के बाद भी आदेशों की अवहेलना जारी रही। मजबूरन एओए को फिर से इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

देविका स्काइपर्स अकेला मामला नहीं
देविका स्काइपर्स का यह प्रकरण कोई अपवाद नहीं, बल्कि गाजियाबाद की दर्जनों सोसायटियों की साझा पीड़ा है। शहर की कई हाईराइज सोसायटियों में फ्लैट्स की रजिस्ट्री हो चुकी है, बैंक लोन चल रहे हैं, एओए भी पंजीकृत हैं, लेकिन विधिवत हैंडओवर आज तक नहीं हुआ। कहीं बिल्डर बिना अधिकार सौंपे ही सोसायटी छोड़ चुके हैं, तो कहीं बायर्स आज भी अपने मूल अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बिना CC–OC के रजिस्ट्री ?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि कुछ मामलों में बिल्डर्स पर कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) और ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट (OC) तक बायर्स को नहीं सौंपे जाने के आरोप हैं, जबकि फ्लैट्स की रजिस्ट्री करा दी गई। यह न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि हजारों परिवारों की सुरक्षा और कानूनी स्थिति पर भी सवाल खड़े करता है।
IFMS: सबसे बड़ा और सबसे खामोश घोटाला
इंटरेस्ट फ्री मेंटेनेंस सिक्योरिटी आज गाजियाबाद की सोसायटियों में सबसे बड़ा विवाद बन चुकी है। करोड़ों रुपये की यह राशि, जो होम बायर्स को वापस लौटानी थी, कई बिल्डर्स ने वर्षों से रोके रखी है। कुछ ने इसे दबाव बनाने का हथियार बनाया, तो कुछ बिना ट्रांसफर किए ही प्रोजेक्ट से निकल गए। यह एक ऐसा “साइलेंट स्कैम” है, जिससे लगभग हर दूसरी सोसायटी प्रभावित है।
आदेशों के बावजूद बच निकलते बिल्डर
कुछ मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्राधिकरण को निपटारे के स्पष्ट निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आदेशों के बाद भी बिल्डर बड़ी चालाकी से बच निकलते हैं।
एओए की संदिग्ध भूमिका भी सवालों में
हालांकि हर मामले में केवल बिल्डर ही दोषी हों, ऐसा भी नहीं। कुछ सोसायटियों में एओए की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं, जहां पारदर्शिता की कमी और आंतरिक गुटबाजी ने बायर्स के हितों को नुकसान पहुंचाया है। इससे बिल्डर्स को भी स्थिति का फायदा उठाने का मौका मिला।
अब सख्ती जरूरी
देविका स्काइपर्स मामले में एफआईआर दर्ज होना एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक संकेत है। यह बताता है कि यदि प्राधिकरण ठान ले, तो कार्रवाई संभव है। कानूनी विशेषज्ञों और होम बायर्स का मानना है कि GDA को ऐसे ही सख्त कदम लगातार उठाने होंगे, तभी बिल्डर्स में कानून का भय पैदा होगा और होम बायर्स को उनके वैध अधिकार मिल पाएंगे।
