समझौता नहीं, संघर्ष: ऑफिसर सिटी–2 AOA ने कैसे बदला शहरी हाउसिंग मॉडल, जानें…

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एक सोसायटी ने ‘बिल्डर सिस्टम’ को हिला दिया!

ऑफिसर सिटी–2 ने पीएनजी जेनरेटर, प्री-पेड मीटर

और एनजीटी के ज़रिए बदली खेल की दिशा

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। एनसीआर के शहरी आवासीय परिदृश्य में एक असहज सच्चाई तेजी से गहराती जा रही है, अधिकांश हाउसिंग सोसायटियाँ बिल्डर के बनाए ढांचे में बस तो जाती हैं, लेकिन अधिकारों के मामले में अक्सर कैद होकर रह जाती हैं। जेनरेटर का ज़हरीला धुआँ हो, अधूरी पर्यावरणीय सुविधाएँ हों या बिजली-पानी की लूट, सब कुछ “समायोजन” के नाम पर सह लिया जाता है। लेकिन गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में स्थित ऑफिसर सिटी–2 ने इस चलन को खुली चुनौती दी है।

डीज़ल की बदबू से पीएनजी की दिशा तक

ऑफिसर सिटी–2 अब राजनगर एक्सटेंशन की पहली आवासीय सोसायटी बनने जा रही है, जहाँ बिजली बैक-अप के लिए डीज़ल आधारित जेनरेटर को हटाकर आईजीएल की पीएनजी गैस से संचालित व्यवस्था लागू की जा रही है। यह बदलाव सिर्फ़ तकनीकी नहीं है, यह उस सोच पर प्रहार है जो वर्षों से कहती रही कि “सोसायटी में इतना बदलाव संभव नहीं।” कम प्रदूषण, कम शोर, कम लागत और बेहतर स्वास्थ्य, यह पहल शहरी पर्यावरण के लिए एक ठोस मॉडल पेश करती है।

डीज़ल से पीएनजी आधारित परिवर्तित जेनरेटर

एनजीटी में वह मुकदमा, जिसने बिल्डर की चुप्पी तोड़ी

इस परिवर्तन के पीछे वह कानूनी संघर्ष है, जो आम तौर पर AOA शुरू ही नहीं करती। वर्ष 2022 में ऑफिसर सिटी–2 अपार्टमेंट ऑनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष गौरव सोनी, सचिव सुशील कुमार त्यागी और निवासी शेषन त्यागी ने बिल्डर के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में याचिका दायर की। मुद्दे सीधे और गंभीर थे, प्रदूषण फैलाते डीज़ल जेनरेटर, धुआँ निकालने के लिए चिमनी तक का अभाव, गैस आधारित जेनरेटर का वादा, लेकिन ज़मीन पर शून्य काम और एसटीपी का न होना, यानी पर्यावरणीय नियमों की खुली अवहेलना। जनवरी 2025 में एनजीटी ने बिल्डर पर 65.70 लाख रुपये का जुर्माना लगाकर यह स्पष्ट कर दिया कि पर्यावरणीय लापरवाही अब “नॉर्मल प्रैक्टिस” नहीं मानी जाएगी।

आदेश के बाद हरकत में आया सिस्टम

एनजीटी के आदेश के बाद वही काम तेजी से होने लगे, जिन्हें वर्षों से “असंभव” बताया जा रहा था। जेनरेटर पर चिमनी लगाई गई, पीएनजी आधारित संचालन लगभग पूरा हो चुका है और एसटीपी निर्माण कार्य शुरू भी प्रारम्भ हो गया है। इससे साफतौर पर यह साबित हुआ कि समस्या तकनीक की नहीं, बल्कि नीयत की थी।

बिजली पर भी बिल्डर का एकाधिकार टूटा

ऑफिसर सिटी–2 पहले ही एक और साहसिक कदम उठा चुकी है। यह वह पहली सोसायटी है जहाँ बिल्डर की सहमति के बिना सरकारी प्री-पेड बिजली मीटर लगाए गए। जिसके परिणामस्वरूप लगभग 300 परिवारों को सीधा फायदा हो रहा है, सस्ती बिजली, पूरा स्वीकृत लोड मिल रहा है और सबसे अहम, बिल में पारदर्शिता है। जहाँ कई सोसायटियों में बिजली बिल आज भी एक रहस्य बना हुआ है, वहीं यहाँ डेटा साफ़ बोलता है।

जब AOA, बिल्डर की ढाल नहीं बल्कि निवासियों की ताक़त बनी

आज यह सवाल ज़रूरी है कि कितनी AOA सच में निवासियों के लिए लड़ती हैं ? कई मामलों में यह सामने आया है कि AOA पदाधिकारी या तो दबाव में आ जाते हैं या फिर निजी लाभ के चलते बिल्डर के साथ समझौता कर लेते हैं। ऑफिसर सिटी–2 का उदाहरण इसलिए असाधारण है क्योंकि यहाँ AOA ने मिलीभगत नहीं, प्रतिरोध चुना

AOA अध्यक्ष गौरव सोनी कहते हैं-

गौरव सोनी

“अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन का काम केवल मेंटेनेंस तक सीमित नहीं होना चाहिए। AOA को निवासियों के अधिकारों की रक्षा करनी होती है, भले ही इसके लिए कानूनी रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े। इस प्रक्रिया में हमें ऐसे प्रस्ताव और प्रलोभन भी मिले, जिनसे समझौते का रास्ता आसान हो सकता था, लेकिन ऑफिसर सिटी–2 में हमने स्पष्ट रूप से तय किया कि सुविधा या लाभ के बदले अधिकारों और पर्यावरण से समझौता नहीं किया जाएगा। हमने वही जिम्मेदारी निभाने का प्रयास किया, जिसकी अपेक्षा निवासियों को अपने प्रतिनिधियों से होती है।”

एक सोसायटी नहीं, एक चेतावनी

ऑफिसर सिटी–2 अब सिर्फ़ एक आवासीय परिसर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है, उन बिल्डरों के लिए जो नियमों को बोझ समझते हैं और उन AOA के लिए जो सोचती हैं कि लड़ाई बेकार है। यह कहानी बताती है कि अगर नेतृत्व में साहस हो, दृष्टि साफ़ हो और निवासी साथ खड़े हों, तो सिस्टम को झुकाया जा सकता है, बिना समझौते, बिना सौदेबाज़ी।

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