सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: सार्वजनिक स्थलों पर नहीं दिखेंगे ‘आवारा कुत्ते’ और ‘आवारा पशु’ राज्यों को 8 हफ्ते में देनी होगी रिपोर्ट!
प्रतीकात्मक इमेज
जनसुरक्षा सर्वोपरि
देश की छवि दांव पर नहीं लग सकती: सर्वोच्च न्यायलय

NEWS1UP
विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। देशभर में बढ़ते आवारा कुत्तों और पशुओं के खतरे पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि अब किसी भी सार्वजनिक स्थान, चाहे स्कूल हो, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डा या खेल परिसर में आवारा कुत्ते या अन्य पशु नहीं दिखने चाहिए।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि इन परिसरों के चारों ओर उचित बाड़ लगाई जाए ताकि आवारा पशु या कुत्तों का प्रवेश पूरी तरह रोका जा सके।
देश की छवि दांव पर नहीं लग सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने चिंता जताई कि आवारा जानवरों के हमलों से जुड़ी घटनाएं देश की जनसुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय साख दोनों को प्रभावित कर रही हैं।
पीठ ने स्पष्ट कहा-
“हम लगातार ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट देख रहे हैं, जिनमें मासूम बच्चे या बुजुर्ग आवारा कुत्तों और पशुओं के हमलों के शिकार बन रहे हैं। यह न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि प्रशासनिक विफलता का प्रतीक भी है।”
टीकाकरण, नसबंदी और शेल्टर होम में स्थानांतरण अनिवार्य

अदालत ने पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम-2023 को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया।
निर्देशों के अनुसार-
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सभी नगर निकाय अपने क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण करें।
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सभी आवारा कुत्तों और पशुओं का अनिवार्य टीकाकरण व नसबंदी की जाए।
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उपचार या नसबंदी के बाद इन्हें निर्दिष्ट शेल्टर होम (आश्रय स्थलों) में रखा जाए।
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इन्हें किसी भी सूरत में दोबारा सड़कों या सार्वजनिक परिसरों में वापस न छोड़ा जाए।
मुख्य सचिव होंगे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव इन आदेशों के पालन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।
कोर्ट ने चेतावनी दी-
“यदि निर्देशों का पालन नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।”
पीठ ने सभी राज्यों से कहा कि वे आठ हफ्तों के भीतर अनुपालन स्थिति रिपोर्ट (Compliance Status Report) अदालत में दाखिल करें और यह बताएं कि उन्होंने अब तक क्या कदम उठाए हैं।
पहले भी जताई थी नाराजगी
यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर सख्ती दिखाई है। पहले भी कोर्ट ने राज्यों से पूछा था कि आखिर एबीसी नियमों के क्रियान्वयन में इतनी लापरवाही क्यों बरती जा रही है। इस बार अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अब “कानून कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए।”
जनसुरक्षा और पशु संरक्षण, दोनों के लिए संतुलित फैसला
कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों की मानें तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल जनसुरक्षा की दिशा में मील का पत्थर है, बल्कि यह पशु कल्याण और शहरी प्रबंधन के बीच एक ज़िम्मेदार संतुलन भी स्थापित करता है। जहां एक ओर आम नागरिकों को सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर राहत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर पशुओं की देखभाल के लिए व्यवस्थित शेल्टर व्यवस्था भी सुनिश्चित होगी।
