वीआईपी शिक्षा के दौर में एक ईमानदार DM!!
भाषणों में सरकारी स्कूल
बच्चों के लिए विदेशी ज़मीन
भूमेश शर्मा
संपादकीय
देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ज़िंदगी से जुड़े दो प्रसंग आज भी सत्ता, नैतिकता और ईमानदारी की कसौटी बने हुए हैं। एक बार उनकी पत्नी सरकारी गाड़ी से बाज़ार चली गईं, यह बात शास्त्री जी को इतनी नागवार गुज़री कि वो कई दिनों तक अपनी पत्नी से नाराज रहे। दूसरे प्रसंग में एक बार जब उनके पोते ने नई स्लेट की मांग की, तो प्रधानमंत्री का जवाब था “बेटा, अभी महीने का अंत है, पैसे नहीं हैं, अगली तनख़्वाह मिलते ही ले आऊंगा।” सत्ता के शिखर पर बैठकर भी निजी जीवन में अनुशासन, सादगी और जवाबदेही, यही शास्त्री जी की असली विरासत थी।
स्कूल गेट पर खड़ा लोकतंत्र का सच
आज, दशकों बाद, यही विरासत हमारे सिस्टम के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। अगर आप किसी बड़े शहर के नामचीन स्कूल के बाहर सुबह या दोपहर खड़े हो जाएँ, तो लोकतंत्र और व्यवस्था की असली तस्वीर अपने-आप साफ़ हो जाएगी। स्कूल गेट के बाहर खड़ी लाल-नीली बत्तियों वाली वीआईपी गाड़ियाँ, ड्राइवर, सुरक्षाकर्मी और भीतर पढ़ते हैं नौकरशाहों, नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बच्चे।
विडंबना यह है कि यही वर्ग मंचों से सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता के कसीदे पढ़ता है, सरकारी स्कूलों के उज्ज्वल भविष्य का दावा करता है और आम नागरिक को उपदेश देता है कि “अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजिए।” सवाल यह है कि जिन संस्थानों पर खुद भरोसा नहीं, उन्हीं को जनता के लिए आदर्श बताने का नैतिक अधिकार आखिर इन्हें किसने दिया ?
यह दोहरा चरित्र केवल नौकरशाही तक सीमित नहीं है। विधायक, सांसद और मंत्री भी इससे अलग नहीं हैं। सत्ता के ऊँचे सिंहासन पर बैठकर आदर्श, संस्कृति और राष्ट्रवाद का भाषण देने वाले कई तथाकथित महापुरुषों के बच्चे यूके, यूएस और ऑस्ट्रेलिया में पढ़ते मिल जाते हैं। अगर सरकारी स्कूल वाकई इतने ही सक्षम हैं, तो इन वीआईपी बच्चों की जगह वहीं क्यों नहीं है ?
बरसों से यह बात कही जाती रही है कि जिस दिन अधिकारी और नेता अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने लगेंगे, उसी दिन देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा दोनों बदल जाएँगी। तब शिक्षा न मुनाफ़े का धंधा रहेगी, न मध्यमवर्ग के लिए बोझ। लेकिन अफ़सोस, यह बात अब तक केवल बहसों और लेखों तक ही सीमित रही है।

चित्रकूट से उठी एक चुप लेकिन तेज़ आवाज़
इसी जमी हुई, संवेदनहीन व्यवस्था के बीच उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। चित्रकूट के जिलाधिकारी और 2016 बैच के यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी पुलकित गर्ग ने अपनी तीन साल की बेटी सिया का दाख़िला किसी इंटरनेशनल या कॉन्वेंट स्कूल में नहीं, बल्कि सरकारी आंगनबाड़ी केंद्र में कराया है।

पुलकित गर्ग का यह फैसला एक साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि पूरे दिखावटी तंत्र के लिए आईना है। उनका कहना है कि समाज को स्टेटस सिंबल और दिखावे से बाहर आकर सरकारी संस्थानों पर भरोसा करना चाहिए। उनके मुताबिक, बच्चे के शुरुआती जीवन में महंगी शिक्षा नहीं, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और संस्कार सबसे ज़रूरी होते हैं और आंगनबाड़ी केंद्र इन ज़रूरतों को बेहतर तरीके से पूरा करते हैं। यहाँ बच्चों को सुरक्षा मिलती है, स्नेह मिलता है और समय मिलता है, जो किसी भी ब्रांडेड स्कूल की चकाचौंध से कहीं ज़्यादा मूल्यवान है।

यह फैसला किसी आर्थिक मजबूरी का नतीजा नहीं है। पुलकित गर्ग की पत्नी स्वयं एक बैंक में अधिकारी हैं। वे चाहें तो अपनी बेटी को देश के किसी भी महंगे और नामचीन स्कूल में पढ़ा सकते थे। लेकिन उन्होंने सुविधा नहीं, सिद्धांत को चुना। उन्होंने वही किया, जो दूसरों को उपदेश देने से पहले खुद करने का नैतिक साहस मांगता है।
आज जब व्यवस्था की संवेदनहीनता पहाड़ बन चुकी है, तब दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ और भी प्रासंगिक हो उठती हैं-
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
चित्रकूट के DM पुलकित गर्ग का यह कदम उसी जमी हुई पीर को पिघलाने की एक ईमानदार कोशिश है। उन्होंने एक व्यक्तिगत निर्णय के ज़रिए पूरे प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को आईना दिखा दिया है।
अब सवाल व्यवस्था से नहीं, बल्कि उन नेताओं और अधिकारियों से है जो सरकारी स्कूलों की तारीफ़ तो करते हैं, लेकिन अपने बच्चों के लिए उन पर भरोसा नहीं करते। क्या अब कोई मंत्री, सांसद या अफसर इस मिसाल से प्रेरणा लेगा ? या फिर शास्त्री जी की सादगी और पुलकित गर्ग की यह पहल भी हमारी व्यवस्था में सिर्फ़ एक ख़बर बनकर रह जाएगी ?
