नोएडा। तरक्की, आधुनिकता और स्मार्ट सिटी का प्रतीक माने जाने वाले शहरों की सड़कों पर आज जो दृश्य उभर रहा है, वह किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे समाज की गहराती बीमार मानसिकता का आईना है। नोएडा के पर्थला पुल और एलिवेटेड रोड पर महिलाओं के साथ हुई अश्लील हरकत का यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि उस नैतिक पतन की पराकाष्ठा है, जिसे हमने लंबे समय तक नजरअंदाज किया है।
चलती कार से महिलाओं की ओर फ्लाइंग किस उछालना, गंदे इशारे करना और एक परिवार का पीछा करना, यह सब किसी नशे या “मस्ती” का परिणाम नहीं, बल्कि उस सोच का नतीजा है जिसमें महिला को सड़क पर चलते हुए भी सुरक्षित नहीं माना जाता। यह घटना बताती है कि शिक्षा की डिग्रियाँ बढ़ी हैं, लेकिन संवेदनाएँ सिकुड़ती जा रही हैं।
सड़क पर सिर्फ गाड़ियाँ नहीं दौड़तीं, सोच भी बेनकाब होती है
घटना के वीडियो में साफ दिखता है कि आरोपी न केवल अश्लील हरकत कर रहे थे, बल्कि मना किए जाने के बावजूद रुके नहीं। सामने एक परिवार था, महिलाएँ थीं, डर और असहायता थी, और दूसरी ओर बेखौफी के नशे में डूबी एक कार और उसमें बैठे युवक। यह टकराव दो वाहनों का नहीं, दो सोचों का है, एक सभ्यता की, दूसरी बर्बरता की।
महिलाओं का डर जाना-पहचाना है। शहर बदलते हैं, सड़कें चौड़ी होती हैं, गाड़ियाँ महंगी हो जाती हैं, लेकिन महिलाओं की असुरक्षा जस की तस बनी रहती है। सवाल यह नहीं कि पुलिस ने कितनी जल्दी कार्रवाई की, सवाल यह है कि ऐसी हरकत करने की हिम्मत आखिर आती कहां से है ?
कार से फ्लाइंग किस का अश्लील इशारा!
कानून ने पकड़ा हाथ, समाज कब पकड़ेगा कॉलर ?
वीडियो वायरल होने के बाद फेज-3 थाना पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए एमजी हेक्टर कार को ट्रेस किया और दो आरोपियों, अमित कुमार और अभिषेक को गिरफ्तार कर लिया। तीसरे आरोपी की तलाश जारी है। पुलिस की यह कार्रवाई जरूरी थी और सराहनीय भी, लेकिन क्या गिरफ्तारी ही समाधान है ?
असल जरूरत उस सामाजिक आत्ममंथन की है, जहां परिवार, स्कूल, समाज और सिस्टम मिलकर यह तय करें कि हम किस तरह के नागरिक गढ़ रहे हैं। क्या हम सिर्फ कमाने, दिखाने और भोगने की शिक्षा दे रहे हैं, या सम्मान, मर्यादा और जिम्मेदारी भी सिखा रहे हैं ?
नोएडा की यह घटना किसी एक सड़क, एक थाना या एक शहर की नहीं है। यह उस चुप्पी के खिलाफ अलार्म है, जो हम रोज़ छोटी-छोटी बदतमीजियों पर साध लेते हैं। आज फ्लाइंग किस है, कल पीछा है, परसों शायद इससे भी खतरनाक कुछ।
समाज को यह समझना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिस का दायित्व नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक सड़क पर गलत हरकत करने वाले को यह डर नहीं होगा कि समाज उसे अस्वीकार करेगा, तब तक कानून अकेला काफी नहीं।