देविका स्काइपर्स सोसाइटी संकट: हैंडओवर न मिलने से भड़का जनाक्रोश!

NEWS1UP
संवाददाता
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित देविका स्काइपर्स सोसाइटी के 648 परिवार आज गंभीर संकट और असुरक्षा के साये में जीवन जीने को मजबूर हैं। दस टॉवर और 12 मंज़िला इस सोसाइटी में वर्ष 2013 में होम बायर्स को पज़ेशन दिया गया था। तभी से अब तक सोसाइटी का मेंटेनेंस बिल्डर के ही हाथों में है। नियमानुसार हैंडओवर न मिलने से नाराज़ निवासियों का सब्र आखिरकार टूट गया और मामला सड़क से लेकर थाने तक जा पहुँचा।
एओए को अब तक नहीं मिला हैंडओवर
वर्ष 2022 में सोसाइटी में अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) का पहला चुनाव हुआ और अप्रैल 2023 में एओए रजिस्ट्रार एक्ट के तहत विधिवत रजिस्टर्ड हो गई। लेकिन डेढ़ साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद बिल्डर ने न तो हैंडओवर दिया और न ही बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त किया।
लिफ्ट हादसे, आग की घटनाएँ और ठप फायर सिस्टम
एओए सदस्य सी. पी. गुप्ता बताते हैं कि-

सोसाइटी में आए दिन लिफ्ट से जुड़ी दुर्घटनाओं की खबरें सामने आती रहती हैं। कुछ दिन पहले एक फ्लैट में आग लगने की घटना ने हालात की भयावहता को उजागर कर दिया। चिंता की बात यह है कि पूरी सोसाइटी केवल 125-125 केवी के दो डीज़ल जेनरेटरों पर निर्भर है, जिनमें से एक लंबे समय से खराब पड़ा है। बिजली जाते ही लिफ्टें बंद हो जाती हैं और 12वीं मंज़िल तक रहने वाले बुज़ुर्गों, महिलाओं और बच्चों को सीढ़ियों के सहारे ही आना-जाना पड़ता है। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सोसाइटी का फायर फाइटिंग सिस्टम पूरी तरह निष्क्रिय है। अग्निशमन विभाग ने फायर एनओसी का नवीनीकरण नहीं किया है और परिसर में बाकायदा चेतावनी नोटिस भी चस्पा किया गया है।
हाईकोर्ट के आदेश भी बेअसर
गुप्ता के अनुसार, वर्ष 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) को बिल्डर से हैंडओवर दिलवाने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। निवासियों ने प्राधिकरण को कई बार लिखित शिकायतें दीं, जनसुनवाई पोर्टल पर भी गुहार लगाई, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
बीती 9 दिसंबर को जीडीए ने बिल्डर और एओए को बैठक के लिए बुलाया, लेकिन बिल्डर पक्ष जानबूझकर नदारद रहा। इससे साफ है कि बिल्डर प्रशासनिक और न्यायिक आदेशों को भी गंभीरता से नहीं ले रहा।
सड़क से थाने तक पहुँचा विरोध
लगातार अनदेखी से आक्रोशित सैकड़ों निवासियों ने आज जनरल बॉडी मीटिंग (GBM) के बाद बिल्डर के खिलाफ जोरदार नारेबाज़ी की और स्थानीय पुलिस चौकी पहुँचे। पुलिस वाहन से उन्हें थाना नंदग्राम भेजा गया, जहाँ यह कहकर लौटा दिया गया कि जिलाधिकारी से मिले बिना बिल्डर के विरुद्ध कोई कार्रवाई संभव नहीं है।
मेंटेनेंस नहीं, पूरा हैंडओवर चाहिए
निवासियों का आरोप है कि बिल्डर केवल औपचारिक तौर पर मेंटेनेंस का हैंडओवर देकर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना चाहता है। जबकि एओए और निवासी नियमानुसार, सुरक्षित और पूरी तरह कार्यशील सोसाइटी का संपूर्ण हैंडओवर चाहते हैं।
लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर यहाँ घर खरीदा था, लेकिन आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि अब वे जिलाधिकारी से मिलकर प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग करेंगे और जब तक स्थायी समाधान नहीं निकलेगा, उनका संघर्ष जारी रहेगा।
बिल्डरों का पुराना खेल: अधूरा हैंडओवर, मजबूर होते बायर्स
देविका स्काइपर्स सोसाइटी का मामला कोई अपवाद नहीं, बल्कि बिल्डर लॉबी का आज़माया हुआ पुराना पैटर्न है। अक्सर देखा गया है कि बिल्डर जानबूझकर बुनियादी सुविधाएँ अधूरी छोड़ देते हैं, सुरक्षा मानकों को ताक पर रख देते हैं और फिर होम बायर्स को इस स्थिति में ला खड़ा करते हैं कि वे आधा-अधूरा हैंडओवर लेने को मजबूर हो जाएँ। यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जाता है, ताकि भविष्य में किसी भी दुर्घटना, तकनीकी खामी या कानूनी पचड़े की ज़िम्मेदारी से बिल्डर खुद को मुक्त कर सके।
प्रशासन की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण में केवल बिल्डर ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और संस्थागत चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जीडीए द्वारा कोई निर्णायक कार्रवाई न किया जाना, बार-बार शिकायतों के बाद भी मामले को टालते रहना और बैठकों में बिल्डर की गैरहाज़िरी पर भी सख्ती न दिखाना, यह सब संदेह को जन्म देता है।
यह मामला अब केवल मेंटेनेंस या हैंडओवर का नहीं रह गया है, बल्कि 648 परिवारों की जान-माल की सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है। निष्क्रिय फायर सिस्टम, खराब जेनरेटर, बार-बार बंद होने वाली लिफ्टें और प्रशासनिक अनदेखी, ये सभी किसी बड़े हादसे को न्योता दे रहे हैं। निवासियों का साफ कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अधूरा या दिखावटी हैंडओवर स्वीकार नहीं करेंगे। उनकी मांग है कि पूरा, नियमसम्मत और सुरक्षित हैंडओवर दिया जाए, दोषी बिल्डर के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो और प्रशासन अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी निभाए।
