‘पॉश एरिया’ लेकिन कमजोर वोट बैंक: राजनगर एक्सटेंशन क्यों बन रहा है सियासी रूप से अदृश्य ?
NEWS1UP February 1, 2026 0
गांवों में वोट, शहर में घर
राजनगर एक्सटेंशन की बड़ी आबादी का विरोधाभास
टैक्स देते हैं, पर राजनीतिक ताकत नहीं
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भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। हॉट सिटी के पॉश माने जाने वाले राजनगर एक्सटेंशन में लोकतंत्र की सेहत आज गंभीर सवालों के घेरे में है। करीब दो लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद मतदाताओं की संख्या महज़ 18 हजार बताई गई। एओए, फेडरेशन, जिलाधिकारी की अपीलों और सामाजिक कार्यकर्ता दीपांशु मित्तल की लगातार कोशिशों के बाद भी केवल 10 हजार नए वोटर जुड़ने की सम्भावना जताई जा रही है। यानी कुल मिलाकर लगभग 28 हजार मतदाता, जो आबादी के अनुपात में बेहद कम हैं।
यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी है। विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि जहां वोटर कम होते हैं, वहां प्रशासनिक और राजनीतिक प्राथमिकताएं भी कमजोर पड़ जाती हैं। नतीजा यह होता है कि समस्याएं बढ़ती हैं, समाधान टलते हैं और जनता की आवाज़ धीरे-धीरे हाशिये पर चली जाती है।

राजनगर एक्सटेंशन में कम वोटरों के पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी सामने आते हैं। यहां बड़ी आबादी ऐसी है जो आसपास के गांवों से आकर यहां रह रही है, लेकिन उन्होंने अपनी वोट गांव में ही रखी हुई है। इसके अलावा बड़ी संख्या में नौकरी-पेशा लोग भी हैं, जो इस इलाके को स्थायी निवास नहीं बल्कि सीमित समय के ठहराव के रूप में देखते हैं। ऐसे लोग वोट ट्रांसफर कराने की जरूरत ही महसूस नहीं करते। ये दोनों कारण मतदाताओं की कम संख्या के अहम पहलू हैं।
हालांकि, यह स्थिति उन लोगों के लिए स्वाभाविक रूप से चिंताजनक है, जिन्होंने अपना गांव, कस्बा या पुराना ठिकाना छोड़कर राजनगर एक्सटेंशन को स्थायी घर के रूप में चुना है। ये लोग यहां टैक्स देते हैं, समस्याएं झेलते हैं, लेकिन वोट की ताकत कम होने के कारण उनकी बात प्रभावी ढंग से सत्ता तक नहीं पहुंच पाती।
सामाजिक कार्यकर्ता दीपांशु मित्तल साफ शब्दों में कहते हैं कि-

“राजनगर एक्सटेंशन पहले से ही प्रशासनिक और राजनीतिक उपेक्षा झेल रहा है। मतदाताओं की संख्या कम होने का सीधा मतलब है, जनप्रतिनिधियों का ध्यान और संसाधन कहीं और शिफ्ट होना। जहां वोट ज़्यादा, वहां सुनवाई ज़्यादा। यहां के लोग अगर मतदाता नहीं बने तो वे केवल जिंदाबाद–मुर्दाबाद तक सीमित रह जाएंगे।”
मित्तल यह भी रेखांकित करते हैं कि अक्सर नागरिक नेताओं और अधिकारियों पर अनदेखी का आरोप लगाते हैं, लेकिन मतदाता के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट जाते हैं। लोकतंत्र में अधिकार मांगने से पहले भागीदारी जरूरी है और भागीदारी का पहला कदम वोटर बनना है।

विडंबना यह है कि राजनगर एक्सटेंशन जैसे पॉश इलाके में आज भी कई स्थानों पर मुकम्मल सड़कें नहीं हैं, जल निकासी की व्यवस्था अधूरी है और बुनियादी सुविधाएं सवालों के घेरे में हैं। बिल्डरों की कथित लूट, प्राधिकरण की बेरुखी और योजनाओं की सुस्त रफ्तार से निवासी पहले ही परेशान हैं। ऐसे में कम वोटरों का संदेश राजनेताओं को इस इलाके से और दूर कर सकता है।
केडीपी ग्रैंड सवाना के पूर्व अध्यक्ष धर्मेंद्र चौधरी इस स्थिति को “खतरे की घंटी” बताते हैं। उनका कहना है कि-

“लोकतंत्र में भागीदारी ही हिस्सेदारी तय करती है। जब भागीदारी कम होती है, तो विकास भी पीछे छूट जाता है। राजनगर एक्सटेंशन के लिए यह बेहद चिंताजनक संकेत है।”
चौधरी ने बताया कि अब व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की तैयारी है, ताकि अधिक से अधिक निवासी अपने वोट यहां ट्रांसफर कराएं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
राजनगर एक्सटेंशन का मामला यह साफ कर देता है कि केवल ऊंची इमारतें, महंगे फ्लैट और गेटेड सोसायटियां किसी क्षेत्र को सशक्त नहीं बनातीं। लोकतांत्रिक ताकत वोट से आती है। यदि यह इलाका अपने वोट बैंक को मजबूत नहीं करता, तो विकास की मांगें फाइलों में ही दम तोड़ती रहेंगी और “पॉश एरिया” का तमगा केवल दिखावे तक सिमटकर रह जाएगा।
