AOA में लोकतंत्र के नाम पर मनमानी !!

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यूपी अपार्टमेंट एक्ट, मॉडल बायलॉज़ और

सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट की खुलेआम अनदेखी!

NEWS1UP

 प्रियंका भरद्वाज

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की बहुमंज़िला आवासीय सोसायटियों में अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) की स्थिति आज एक गहरे संस्थागत संकट का संकेत देती है। जिन संस्थाओं का गठन सामूहिक सहभागिता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के उद्देश्य से किया गया था, वे अनेक स्थानों पर सीमित व्यक्तियों के नियंत्रण में सिमटती जा रही हैं। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद की हाई राइज सोसाइटियों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के बाद कई चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं। यहाँ जमकर नियम तोड़े जा रहे हैं, AOA में सत्ता सिमटी हुई हैं, आमसभा हाशिये पर हैं, जांच होती है,आरोप साबित होते हैं, लेकिन कार्रवाई ?? 

यूपी अपार्टमेंट एक्ट, मॉडल बायलॉज़, सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट सबकुछ मखौल बनकर रह गया है।

एनएच–24 पर स्थित एक प्रतिष्ठित सोसायटी से उपजा हालिया विवाद इसी प्रवृत्ति का एक और उदाहरण है। इसमें नाम, स्थान, तारीखें और आंकड़े अलग हो सकते हैं परन्तु क्षेत्र की बहुत सी सोसायटियों में कमोबेश यही हाल दिखाई पड़ता है। सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष द्वारा जिलाधिकारी एवं डिप्टी रजिस्ट्रार को प्रस्तुत शिकायत और उस पर दर्जनों निवासियों के हस्ताक्षर यह स्पष्ट करते हैं कि असंतोष आकस्मिक नहीं, बल्कि लंबे समय से उपजा हुआ है।

पुराने मामलों से मिलते संकेत

ऊपर वर्णित सोसाइटी का मामला कोई अपवाद नहीं है। इसी कैंपस की एक सोसाइटी और राजनगर एक्सटेंशन स्थित एक अन्य सोसाइटी पहले ही इस संकट की गंभीरता को रेखांकित कर चुकी हैं। इन दोनों सोसायटियों में प्रशासनिक ऑडिट के दौरान वित्तीय अनियमितताएं, उपविधियों का उल्लंघन  और AOA द्वारा अधिकारों के अतिक्रमण जैसे अति गंभीर तथ्य सामने आए। इसके बावजूद यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि जाँच के बाद ठोस प्रशासनिक एवं कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?

जांच रिपोर्टों का तैयार हो जाना पर्याप्त नहीं होता। जब तक उनके आधार पर उत्तरदायित्व तय न किया जाए, तब तक ऐसी रिपोर्टें केवल कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।

प्रशासनिक निष्क्रियता का दुष्परिणाम

इन मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि AOA पर प्रशासनिक निगरानी नाममात्र की रह गई है। शिकायतें दर्ज होती हैं, जांच बैठती है, अनियमितताओं का उल्लेख होता है, परंतु निर्णय और दंड की प्रक्रिया अक्सर वहीं ठहर जाती है। 

इससे एक खतरनाक संदेश जाता है कि नियमों का उल्लंघन दंडनीय अपराध नहीं, बल्कि सहनीय चूक है।

मनमाना चुनाव मनचाहे मौके पर

कई मामलों में यह पाया गया है कि कार्यकाल समाप्ति के निकट पहुँचते ही AOA का वर्तमान बोर्ड आगामी चुनावों को लेकर उदासीन हो जाता है। जबकि सत्ता में आने से पूर्व वही बोर्ड पद और अधिकार प्राप्त करने के लिए अत्यधिक सक्रिय और उत्सुक दिखाई देता था। चुनाव स्थगित करने के लिए प्रायः यह तर्क दिए जाते हैं कि सुधारात्मक कार्य प्रचलन में हैं, उनकी निगरानी आवश्यक है अथवा प्रस्तावित विकास कार्य अभी पूर्ण नहीं हुए हैं। किंतु व्यवहारिक रूप से ऐसे बहाने अक्सर जवाबदेही से बचने का माध्यम साबित सो सकते हैं।

वास्तविक कारणों में वित्तीय अनियमितताओं की आशंका, अपारदर्शी ढंग से दिए गए टेंडर/कॉन्ट्रैक्ट, तथाकथित सुधारात्मक प्रक्रियाओं का अनावश्यक विस्तार, बोर्ड सदस्यों के बीच आंतरिक विवाद तथा संभावित प्रतिद्वंद्वियों से उपजा हित–संघर्ष सम्मिलित होते हैं।समय पर चुनाव न कराना मॉडल बायलॉज का उल्लंघन मात्र नहीं, बल्कि AOA के लोकतांत्रिक चरित्र को कमजोर करने वाला कृत्य है, जिससे निवासियों के प्रति बोर्ड की वैधानिक जवाबदेही प्रभावित होती है।

लोकतांत्रिक संस्था का क्षरण

अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन किसी कार्यालयीन समिति का नाम नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक निकाय है। आमसभा, वित्तीय पारदर्शिता और सामूहिक सहमति इसकी आत्मा हैं। जब ये तत्व कमजोर पड़ते हैं, तो AOA निवासियों की प्रतिनिधि संस्था नहीं रह जाती, बल्कि एक ‘मनमाने प्रबंधन तंत्र’ में बदल जाती है।

प्रायः प्रशासनिक जाँच में पाई गईं अनियमितताएं और घोटाले बताते हैं कि समस्या व्यक्तियों की नहीं, व्यवस्था की है।

अब निर्णय का समय

प्रशासन के सामने अब केवल किसी सोसायटी या किसी शिकायत विशेष का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न है कि क्या शहरी आवासीय व्यवस्थाओं में लोकतांत्रिक संस्थाओं को वास्तविक अधिकार और संरक्षण मिलेगा या वे केवल पंजीकरण प्रमाणपत्र तक सीमित रह जाएंगी।

यदि जाँच में अनियमितताएं सिद्ध होने के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो AOA व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास और अधिक डगमगाएगा।

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार एवं समाज सेविका हैं

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