October 16, 2026
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42 साल बाद टूटी उम्रकैद की बेड़ियाँ, सौ साल के बुज़ुर्ग को हाई कोर्ट से राहत!

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ALLAHABAD

1982 की हत्या, 1984 की सजा और 2026 में इंसाफ

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देरी, उम्र और कमजोर साक्ष्यों को

बनाया बरी करने का आधार

NEWS1UP 

विशेष संवाददता

हमीरपुर। न्याय की लंबी गलियों में कभी-कभी फैसले कानून से ज्यादा समय की कहानी कहने लगते हैं। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के हमीरपुर से जुड़ा है, जहां हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए धनी राम को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 42 साल बाद सभी आरोपों से बरी कर दिया। उम्र लगभग 100 साल, शरीर थका हुआ और जिंदगी का अधिकांश हिस्सा अदालतों की तारीखों के बीच गुजर चुका है। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने स्पष्ट कहा कि अपील के दशकों तक लंबित रहने के दौरान आरोपी द्वारा झेली गई मानसिक पीड़ा, सामाजिक कलंक और अनिश्चितता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “उचित संदेह से परे” साबित करने में विफल रहा।

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1982 की एक शाम, जो 42 साल तक पीछा करती रही

मामला 9 अगस्त 1982 का है। शिकायतकर्ता और उसका भाई गुनुवा घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में मैकू नामक व्यक्ति उनसे टकराया। आरोप है कि मैकू के हाथ में बंदूक थी और उसके साथ सत्ती दीन व धनी राम मौजूद थे। कथित तौर पर सत्ती दीन और धनी राम ने मैकू को गुनुवा की हत्या के लिए उकसाया। पुरानी रंजिश के चलते मैकू ने गोली चला दी और गुनुवा की मौके पर ही मौत हो गई।

जुलाई 1984 में हमीरपुर के अपर सत्र न्यायाधीश ने सत्ती दीन और धनी राम को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हालांकि, धनी राम को उसी साल जमानत मिल गई। मुख्य आरोपी मैकू कभी पकड़ा नहीं गया, जबकि सत्ती दीन की अपील लंबित रहते ही मौत हो गई। अंततः हाई कोर्ट के सामने केवल धनी राम का मामला बचा।

कोर्ट की नजर में “देरी” भी एक सच्चाई

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि धनी राम की भूमिका केवल उकसाने तक सीमित थी और अब वह लगभग 100 वर्ष के हैं। हाई कोर्ट ने न सिर्फ साक्ष्यों की कमजोरी पर ध्यान दिया, बल्कि यह भी कहा कि इतने लंबे समय तक अपील लंबित रहना अपने आप में एक गंभीर तथ्य है। अदालत ने माना कि कानून केवल दंड का औजार नहीं, बल्कि न्याय और मानवीय दृष्टिकोण का माध्यम भी है।

धनी राम की जमानत को औपचारिक रूप से निरस्त करते हुए हाई कोर्ट ने मुकदमे का पटाक्षेप कर दिया।

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