चाइनीज मांझे ने छीन ली शोएब की जिंदगी, सिस्टम की लापरवाही फिर बेनकाब!

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दो मासूम बेटियों के सिर से उठा साया

सवालों के कटघरे में प्रशासन!

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

लखनऊ। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था। यह एक सोची-समझी लापरवाही का नतीजा था। यह उस खामोश तंत्र की कहानी है, जो जानता सब कुछ है, मानता भी है, लेकिन जागता तब है जब किसी घर का चिराग बुझ जाता है। 32 साल के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव शोएब की मौत ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है, क्या कुछ हजार रुपये के मुनाफे के लिए इंसानी जान की कोई कीमत नहीं बची ?

हैदरगंज तिराहे के पास फ्लाइओवर पर बाइक से गुजरते शोएब को यह अंदाजा तक नहीं था कि हवा में फैली एक अदृश्य मौत उनकी गर्दन काट देगी। चाइनीज मांझा, जिस पर कोर्ट और NGT का बैन है उनकी गर्दन में फंसा और पल भर में सब खत्म हो गया। खून से लथपथ शोएब सड़क पर गिर पड़े। ट्रामा सेंटर तक पहुंचाए गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मां, पत्नी और दो मासूम बेटियों का उजड़ा संसार

पुराने लखनऊ के दुबग्गा इलाके में रहने वाला शोएब अपने परिवार का एकमात्र सहारा था। मां, पत्नी और दो छोटी बेटियां, जिन्हें अभी यह भी नहीं पता कि उनके पापा अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। यह दर्द सिर्फ एक परिवार का नहीं है, यह उस समाज का आईना है जो हर साल पतंगबाजी के नाम पर मौत को हवा में उड़ने देता है।

बैन सिर्फ कागजों में, बाजार में खुलेआम बिक रहा मौत का धागा

चाइनीज मांझे पर सख्त कानून हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, BNS की धाराएं, सजा, जुर्माना, सब तय है। फिर सवाल उठता है कि जब कानून मौजूद है तो यह मांझा बाजार तक पहुंच कैसे रहा है ?
दुकानदार जानते हैं कि यह जानलेवा है। पतंगबाज जानते हैं कि यह खतरनाक है। प्रशासन भी जानता है कि यह प्रतिबंधित है। फिर भी यह बिकता है, उड़ता है और लोगों की गर्दनें काटता है। क्योंकि यह सस्ता है, मजबूत है और “पतंग नहीं कटती” लेकिन इंसान जरूर कट जाता है।

छापेमारी तब, जब मौत हो चुकी

शोएब की मौत के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त कार्रवाई के आदेश दिए। पुलिस ने छापेमारी की, दुकानों से मांझा जब्त हुआ, गिरफ्तारियां हुईं। काश कि अगर यह कार्रवाई पहले होती, तो आज शोएब जिंदा होता! हर हादसे के बाद अभियान चलाना अब एक रस्म बन चुका है। कुछ दिन शोर, कुछ दिन कार्रवाई और फिर वही चुप्पी। जब तक अगली लाश नहीं गिरती।

चाइनीज मांझा: सिर्फ धागा नहीं, उड़ती हुई तलवार

मेटैलिक पाउडर, नायलॉन, कांच, लोहे के बुरादे से बना यह मांझा सिर्फ पतंग नहीं काटता बल्कि यह गर्दन, हाथ, नसें, और जिंदगी काटता है। इंसान ही नहीं, पक्षी, जानवर सब इसके शिकार हैं। इसके बावजूद इसे ऑनलाइन बेचा जा रहा है, दुकानों में छिपाकर रखा जा रहा है।

सवाल सिर्फ कानून का नहीं, ज़मीर का भी है

शोएब की मौत ने एक कड़वा सच उजागर किया है कि यह समाज कुछ पैसों के लिए मौत तक का सौदा करने को तैयार है। जब तक इसे “हादसा” कहकर टालते रहेंगे, तब तक अगला शोएब, अगली गर्दन, अगला परिवार उजड़ता रहेगा।

अब वक्त है कि चाइनीज मांझे को सिर्फ जब्त नहीं, जड़ से खत्म किया जाए। वरना पतंगें उड़ती रहेंगी और लाशें गिरती रहेंगी।

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