समस्या नहीं सुलझी, तो वोट नहीं! सोसाइटी में नेताओं की ‘नो एंट्री’!
यह सिर्फ़ एक सोसायटी की कहानी नहीं,
यह शहरी भारत में बढ़ती नागरिक हताशा और प्रतिरोध की दस्तक है।
NEWS1UP
रेनू शिरीष शर्मा
मुंबई। चुनाव आते ही नेता जनता के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं, लेकिन जब जनता महीनों तक प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के दरवाज़े खटखटाए और जवाब में सिर्फ़ चुप्पी मिले तो क्या होता है ? मीरा रोड पूर्व की इंद्रप्रस्थ सोसायटी में यही हुआ है। फर्क बस इतना है कि यहां जनता ने शिकायत नहीं, फैसला सुनाया है।
800 से अधिक परिवारों वाली इस सोसायटी ने अपने गेट पर ऐसा बैनर टांगा है, जिसने नेताओं की चुनावी रणनीति पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है-
“समस्या नहीं सुलझी, तो वोट नहीं। नेताओं की एंट्री बंद।”
यह कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता के खिलाफ़ नागरिकों का सामूहिक आरोप-पत्र है।
धार्मिक आयोजन या कानून से परे शोरगुल ?
इंद्रप्रस्थ सोसायटी के सामने स्थित बापा सीताराम मंदिर अब सिर्फ़ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि लगातार हो रहे विवाह समारोहों और निजी आयोजनों का केंद्र बन चुका है। निवासियों का आरोप है कि यहां महीनों से नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है, रात 12:30–1:00 बजे तक तेज़ डीजे, बैंड और पटाखों का शोर रहता है। बिना अनुमति बारातें सड़क घेरे रहती हैं।
यहाँ सवाल यह नहीं है कि शादी हो रही है, सवाल यह है कि क्या शादी के नाम पर कानून स्थगित हो जाता है ?

त्योहारों पर 10 बजे की पाबंदी, तो शादियों को छूट क्यों ?
निवासियों का कहना है कि नवरात्रि, गणेशोत्सव या दिवाली पर पुलिस ठीक रात 10 बजे लाउडस्पीकर बंद करवा देती है। तो फिर विवाह समारोहों में देर रात तक शोर की अनुमति किस नियम के तहत दी जा रही है ? क्या शोर नियंत्रण कानून सिर्फ़ आम नागरिकों के लिए है ? या फिर आयोजकों के लिए अलग संविधान लागू होता है ?
इमरजेंसी में फंस जाती है ज़िंदगी
निवासी बताते हैं कि मामला केवल शोर का नहीं, सुरक्षा और जीवन का भी है। मंदिर में आने वाली बारातों के कारण सोसायटी का मुख्य प्रवेश द्वार घंटों तक बंद रहता है। एम्बुलेंस अंदर नहीं आ पाती, टैक्सी गेट तक नहीं पहुंच पाती। बुजुर्ग और बीमार लोग मजबूरी में मुख्य सड़क पर उतरकर पैदल चलने को विवश होते हैं।
निवासियों का कहना है-
“अगर किसी की जान चली जाए, तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा ?”
नेताओं से शिकायत, जवाब में सिर्फ़ आश्वासन
सोसायटी के सदस्यों का दावा है कि उन्होंने स्थानीय पुलिस, मनपा अधिकारी, क्षेत्रीय नेता तथा निर्वाचित जनप्रतिनिधि सबको बार-बार शिकायत दी। लेकिन हर बार मिला सिर्फ़ एक जवाब, “देखते हैं।” अब जब चुनाव नज़दीक हैं, तो इंद्रप्रस्थ के निवासियों ने भी साफ़ कह दिया है-
“अब हम भी देखेंगे।”
‘नो हेल्प, नो वोट’ नहीं, यह नागरिक चेतावनी है
यह बैनर किसी एक पार्टी के खिलाफ़ नहीं है। यह पूरे सिस्टम के खिलाफ़ है, जो वोट के समय जनता को याद करता है और समस्या के समय भूल जाता है। इंद्रप्रस्थ सोसायटी का यह कदम एक सवाल छोड़ जाता है कि अगर कानून, प्रशासन और जनप्रतिनिधि समय पर काम करते, तो क्या जनता को अपने गेट पर लोकतंत्र को रोकना पड़ता ?
