विनोद कुमार शुक्ल को ‘विश्व हिन्दी अधिष्ठान’ की श्रद्धांजलि
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साहित्य डेस्क
रायगढ़। हिन्दी साहित्य के अप्रतिम समकालीन कवि–कथाकार, ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत, सहज मानवीय संवेदना के अद्वितीय रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल के निधन से हिन्दी साहित्य जगत् में एक ऐसा रिक्त स्थान बन गया है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में असंभव प्रतीत होती है। उनकी लेखनी ने साधारण जीवन, छोटे मनुष्य और मौन पीड़ा को जिस गहराई, करुणा और सौंदर्य के साथ शब्द दिए, वह उन्हें समकालीन हिन्दी साहित्य में एक अलग और कालजयी पहचान प्रदान करता है।
विश्व हिन्दी अधिष्ठान (न्यास), रायगढ़ के संस्थापक डॉ. मीनकेतन प्रधान ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा कि “विनोद कुमार शुक्ल की रचनाधर्मिता में जनसंवेदना और मानवीय मूल्यों का गहरा प्रभाव रहा। उन्होंने कभी ऊँचे मंच से नहीं, बल्कि जीवन की जमीन से बोलते हुए साहित्य रचा। इसी कारण उनकी कृतियाँ समय की सीमाओं को लाँघकर कालजयी बन गईं।”
डॉ. प्रधान के अनुसार विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएँ शोर नहीं करतीं, बल्कि चुपचाप पाठक के भीतर उतरकर मनुष्य होने का अर्थ समझाती हैं। उनकी भाषा में नाटकीयता नहीं, बल्कि ऐसा सघन आत्मीयपन है जो पाठक को अपने ही जीवन से साक्षात्कार करा देता है।
विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ हिन्दी कथा साहित्य का एक मील का पत्थर माना जाता है, जिसमें मध्यवर्गीय जीवन की विवशताओं और आत्मसम्मान की सूक्ष्म परतें अत्यंत मार्मिक ढंग से उभरती हैं। इसके साथ ही ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ जैसे उपन्यासों ने कथा-भाषा को एक नया सौंदर्यबोध दिया।
उनके कहानी संग्रह ‘पेड़ पर कमरा’ और कविता संग्रह ‘लगभग जय हिन्द’, ‘वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह’, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ हिन्दी कविता की संवेदनात्मक ऊँचाइयों के उदाहरण हैं। इन रचनाओं में साधारण शब्दों के भीतर असाधारण अर्थ छिपे हुए हैं, यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति रही।
इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार पाठक (पूर्व अध्यक्ष, राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़) एवं डॉ. विनोद कुमार वर्मा ने विनोद कुमार शुक्ल के निधन को हिन्दी जगत् की अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए संवेदना, नैतिकता और मानवीय गरिमा का पाठ पढ़ाती रहेंगी।
श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में अंजनी कुमार तिवारी सुधाकर, डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह, रेनू सामल, सुरेन्द्र बंसल, पुष्पांजलि दासे, लिंगम चिरंजीव राव, प्रो. मुन्ना लाल गुप्ता, डॉ. अर्चना पांडेय, डॉ. गजेन्द्र तिवारी, रमेश चन्द्र श्रीवास्तव, सोनल मावतवाल श्रीवास, अमित सदावर्ती, डॉ. रश्मि शुक्ला, प्रमिला पटेल, डॉ. बेठियार सिंह साहू, डॉ. अनिल सक्सेना, नरेंद्र पटेल, पूनम पाठक, डॉ. सुनीता राठौर, प्रीतम, पूर्णचन्द्र बेहरा, डॉ. गौकरण जायसवाल, काव्यांशी मिश्रा, डॉ. रंजना मिश्रा, निर्भय राम गुप्ता, हेमराज, ममता सिंह, रविदत्त शर्मा, डॉ. योगिता वाजपेई, अनिल कुमार पांडेय, प्रो. पोटकुले हिरा तुकाराम, शीतल पाटनवार, शत्रुघ्न जेसवानी, डॉ. विद्या प्रधान, सौरभ सराफ, निमाई प्रधान, जगदीश यादव, डॉ. राजेश दुबे, मनोहरण सिंह ठाकुर, बनवारी लाल देवांगन सहित अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी एवं हिन्दी प्रेमी शामिल रहे।
