जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स: सीवर में डूबता भरोसा, एफआईआर का धुंधलका और प्रशासन की चुप्पी!

8 इंच की पाइप, 20 टावरों का बोझ
किसने दी मंज़ूरी ?
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। नेशनल हाइवे-24 स्थित स्थित ‘जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स टाउनशिप’ में हालात अब महज़ “तकनीकी कमी” का मामला नहीं रहे। यह साफ़ तौर पर योजना की विफलता, बिल्डर की लापरवाही और प्रशासनिक शिथिलता का संयुक्त परिणाम दिखाई देता है। यहाँ शिफ्ट हो चुके करीब करीब 700 परिवार ऐसी बुनियादी समस्या से जूझ रहे हैं, जिसे प्रोजेक्ट की शुरुआती अवस्था में ही रोका जा सकता था। अभी हजारों परिवारों का इस टाउनशिप में आना बाकी है। दिव्यांश ऑनिक्स, रुचिरा सफायर, गोल्डन गेट और एरोकॉन रेनबो के सीवर निकासी के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं है। गंदे और बदबूदार पानी को खुले गड्ढों में फेंका जा रहा है।
8 इंच की पाइपलाइन पर 20 टावरों का बोझ
निवासियों के अनुसार टाउनशिप की पूरी आबादी एक 8 इंच व्यास की सीवर लाइन पर निर्भर है। वर्तमान में 10 टावर खड़े हैं, जबकि 8–10 और प्रस्तावित हैं।
सवाल सीधा है-
जब मौजूदा संरचना वर्तमान लोड भी नहीं संभाल पा रही, तो विस्तार किस तर्क पर किया जा रहा है ?
निवासियों का आरोप है कि डेवलपर ने पर्याप्त सीवर क्षमता सुनिश्चित किए बिना टावर लॉन्च किए, फ्लैट बेचे और राजस्व जुटाया। बुनियादी ढांचे की मजबूती के बजाय बिक्री को प्राथमिकता दी गई। आज स्थिति यह है कि सीवर का पानी सड़कों पर बहता है, पंप लगाकर अस्थायी राहत दी जाती है और कुछ घंटों में समस्या फिर लौट आती है। यह “मेंटेनेंस” नहीं, मूल डिजाइन की विफलता है। दूसरी ओर, नियामक संस्था गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) पर निगरानी में ढिलाई के आरोप लग रहे हैं।
एफआईआर का दावा और उलझन
जीडीए के सहायक अभियंता पियूष सिंह ने कथित रूप से कहा कि बिल्डर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने हेतु थाना वेव सिटी को तहरीर दे दी गई है। लेकिन पुलिस थाना स्तर पर तहरीर को लेकर विरोधाभासी बयान सामने आए, पहले मिलने की बात, फिर न मिलने की। इस विरोधाभास ने निवासियों के बीच अविश्वास और बढ़ा दिया है।
हम टैक्स देते हैं, बदले में बदबू मिल रही है: अंजली गंगवार
टाउनशिप की निवासी अंजली गंगवार कहती हैं:

“हमने अपने जीवन की कमाई लगाकर घर खरीदा था, लेकिन यहां बुनियादी सीवर व्यवस्था तक ठीक नहीं है। हर बार पंप लगाकर दिखावा कर दिया जाता है। जिसके कारण आने-जाने तक में असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। बच्चों को स्कूल भेजने और लेकर आना मुश्किल हो रहा है।
टाउनशिप निवासियों का आरोप है कि बिल्डर ने ‘पहले बिक्री, बाद में व्यवस्था’ का मॉडल अपनाया। क्या यही विकास है ? बिल्डर ने पहले ढांचा तैयार क्यों नहीं किया ? और प्रशासन आंखें बंद करके अनुमति कैसे देता रहा ? “अगर आज 10 टावर का सीवर नहीं संभल रहा, तो 20 टावर का क्या होगा ? क्या हमारे बच्चों की सुरक्षा किसी की प्राथमिकता नहीं है ?”
खुले गड्ढे, बदबू, बीमारी का खतरा: वीना मानी
एक अन्य निवासी वीना मानी प्रशासन की भूमिका पर सीधा सवाल उठाती हैं:

“यह केवल सीवर का मामला नहीं है, यह हमारी सुरक्षा का सवाल है। खुले गड्ढे हैं, बदबू है, बीमारी का खतरा है। अगर कल कोई हादसा होता है तो जिम्मेदारी कौन लेगा, बिल्डर या प्रशासन ?”
एफआईआर की बात केवल बयान है या सच ?
प्रशासन की भूमिका पर सीधा सवाल उठाते हुए एक अन्य निवासी कहते हैं कि-
“हमें बताया गया कि बिल्डर के खिलाफ एफआईआर के लिए तहरीर दे दी गई है। फिर पुलिस कहती है कि तहरीर नहीं मिली। सच क्या है ? अगर तहरीर दी गई है तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती ?”
बिल्डर और प्रशासन, दोनों पर सवाल
निवासियों का कहना है कि बिल्डर ने तकनीकी क्षमता की अनदेखी की और प्रशासन ने निगरानी की जिम्मेदारी गंभीरता से नहीं निभाई। क्या परियोजना स्वीकृति से पहले पूर्ण सीवर क्षमता का आकलन हुआ था ? क्या विस्तार की अनुमति देते समय भविष्य के लोड का विश्लेषण किया गया ? यदि हुआ, तो मौजूदा संकट क्यों है ? जब एफआईआर पर अस्पष्टता हो, प्रवर्तन की घोषणा के बावजूद कार्रवाई न दिखे और बुनियादी ढांचा चरमराता रहे, तो सवाल स्वाभाविक हैं।

