February 20, 2026

मोती रेसीडेंसी: CC-OC नहीं, फिर भी रजिस्ट्री और लोन! बिल्डर, व्यवस्था या बायर जिम्मेदार कौन ?

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मेंटिनेंस में बढ़ोतरी, कथित जीएसटी गड़बड़ी

 बिना CC-OC के पजेशन

बिल्डर व प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल

NEWS1UP

डेस्क रिपोर्टर

गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित ‘मोती रेजीडेंसी’ एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है। वर्ष 2013-14 में जिन होम बायर्स को पजेशन दिया गया और 2018-19 में रजिस्ट्रियां भी शुरू हो गईं, आज वही 408 फ्लैट मालिक अपने घरों के कानूनी अस्तित्व और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। एक तरफ बढ़े हुए मेंटिनेंस शुल्क का आर्थिक बोझ, दूसरी ओर अपने ही घर के कानूनी अस्तित्व पर अनिश्चितता।

मेंटिनेंस चार्ज में अचानक बढ़ोतरी, निवासियों में रोष

मेंटिनेंस शुल्क में वृद्धि का विरोध दर्ज कराते निवासी

सोसाइटी में बिल्डर की मेंटिनेंस एजेंसी ने बिना किसी जनरल बॉडी मीटिंग या निवासियों की सहमति के मेंटिनेंस शुल्क 1.60 रुपये प्रति वर्गफुट से बढ़ाकर 2.00 रुपये प्रति वर्गफुट कर दिया। निवासियों का आरोप है कि 1.60 रुपये प्रति वर्गफुट में 18% GST जीएसटी अलग से चुकाया है, लेकिन कथित तौर पर कभी जीएसटी जमा नहीं की गई। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह जीएसटी अधिनियम, 2017 के तहत गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला बन सकता है।

निवासी रीता मिश्रा कहती हैं-

रीता मिश्रा

“हमसे वर्षों तक यह कहकर पैसे लिए गए कि इसमें जीएसटी शामिल है। अगर जीएसटी जमा ही नहीं की गई तो यह सीधा-सीधा हमारे साथ आर्थिक छल है। अब बिना मीटिंग के मेंटिनेंस बढ़ाना और भी गलत है।”

वहीं, निवासी अमित कुमार सिंह का कहना है-

अमित कुमार सिंह

“मेंटिनेंस बढ़ोतरी का फैसला पारदर्शी तरीके से होना चाहिए था। हम नियमित भुगतान करते रहे, लेकिन हिसाब-किताब कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। यह तरीका अस्वीकार्य है।”

निवासियों का यह भी आरोप है कि पुरानी एजेंसी पर सवाल उठने के बाद बिल्डर ने एक नई कंपनी बनाकर उसे मेंटिनेंस सौंप दी, जिससे पुराने लेन-देन पर पर्दा डालने की आशंका गहरा गई है।

कानूनी अस्तित्व पर संकट: CC और OC नहीं

सोसाइटी की सबसे गंभीर समस्या उसके कानूनी दर्जे को लेकर है। दिसंबर 2024 में निवासियों ने एओए का गठन किया। पंजीकरण के दौरान डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय में कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) मांगा गया। 14 मई 2025 को डिप्टी रजिस्ट्रार ने GDA को पत्र लिखकर सोसाइटी के पूर्णता प्रमाण पत्र की जानकारी मांगी,13 जून 2025 को प्राधिकरण ने अपने जवाब में लिखा कि विकासकर्ता को सीसी जारी नहीं किया गया है। तब से एओए के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया भी अटकी पड़ी है। निवासियों के मुताबिक ओक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) भी उपलब्ध नहीं है।

7 फरवरी 2026 को GDA ने अपने एक आदेश के अंतर्गत मोती रेजीडेंसी के बिल्डर की फर्म मै. बिल्डवैल प्राइवेट लिमिटेड के रजिस्ट्रेशन को यूपी अपार्टमेंट 2010/आदर्श उपविधि 2011 तथा UP RERA एक्ट-2016 के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोप में निरस्त करने की बात भी कही है।

रीता मिश्रा कहती हैं-

“अगर हमारे पास CC और OC नहीं है तो हम किस आधार पर अपने घर में रह रहे हैं ? हमने बैंक से लोन लिया, रजिस्ट्री कराई तो फिर यह जिम्मेदारी किसकी है ?”

अमित कुमार सिंह जोड़ते हैं-

“यह केवल कागजी कमी नहीं है। अगर कल कोई कानूनी या सुरक्षा संबंधी समस्या आती है तो जवाबदेह कौन होगा ? प्रशासन और बिल्डर दोनों को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।”

बिना CC-OC के क्या हैं जोखिम ?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) निर्माण की स्वीकृत पूर्णता का प्रमाण है। जबकि ओक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) भवन में वैध निवास की अनुमति देता है। बिना इन दस्तावेजों के भवन की वैध स्थिति संदिग्ध रहती है। भविष्य में बीमा, पुनर्विक्रय या बैंकिंग लोन प्रक्रिया में जटिलताएं हो सकती हैं। और किसी दुर्घटना की स्थिति में जवाबदेही तय करना कठिन हो सकता है।

बड़े सवाल

बिना CC/OC के वर्षों तक पजेशन कैसे दिया गया ?

रजिस्ट्रियां किन आधारों पर हुईं ?

“डीम्ड कम्प्लीशन” का दावा यदि किया गया, तो उसका दस्तावेजी आधार क्या है ?

‘मोती रेजीडेंसी’ में रहने वाले परिवार आज केवल बढ़े हुए मेंटिनेंस शुल्क से नहीं, बल्कि अपने घर के कानूनी भविष्य को लेकर चिंतित हैं। निवासियों की मांग साफ है मेंटिनेंस की पारदर्शी ऑडिट हो, कथित जीएसटी वसूली की जांच हो और विकास प्राधिकरण के समक्ष लंबित कम्प्लीशन व ओक्यूपेंसी प्रमाणपत्रों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।  

आमतौर पर यह देखा गया है कि फ्लैटों में रहने वाले अधिकतर लोग उच्च शिक्षित और जागरूक होते हैं पर फिर भी अन्य-अन्य बिल्डिंगों में बिल्डरों के षड्यंत्र का शिकार हो जाने की ख़बरें पढ़ी-सुनी जाती हैं। बात बिगड़ जाने पर बिल्डरों को दोषी ठहराने वाले होम बायर्स आखिर अपने सपनों का घर खरीदते समय सटीक जानकारी लेना क्यों उचित नहीं समझते ?

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