प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना क्यों नहीं दे पाई अपेक्षित परिणाम ?
कम वजीफा, लंबी अवधि, सीमित आयु सीमा और रोजगार की अनिश्चितता ?
पायलट चरण ने उठाए कई अहम सवाल!
NEWS1UP
बिजनेस डेस्क
देश के युवाओं को कॉरपोरेट जगत से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना अपनी मंशा के अनुरूप परिणाम देने में अब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकी है। शुरुआती पायलट चरणों के अनुभव यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल क्रियान्वयन की नहीं, बल्कि योजना की संरचना और युवाओं की अपेक्षाओं के बीच संतुलन की भी हो सकती है।
योजना का मौजूदा स्वरूप
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना का लक्ष्य 12 महीनों के लिए देश की शीर्ष 500 कंपनियों में युवाओं को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग उपलब्ध कराना है। वर्तमान में 21 से 24 वर्ष आयु वर्ग के युवा इसके लिए पात्र हैं। चयनित उम्मीदवारों को प्रति माह 5,000 रुपये का वजीफा और 6,000 रुपये की एकमुश्त सहायता दी जाती है। आवेदन आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन स्वीकार किए जाते हैं।
योजना की परिकल्पना युवाओं को कॉरपोरेट कार्य संस्कृति से परिचित कराने और उन्हें रोजगार के लिए तैयार करने के उद्देश्य से की गई थी।

भागीदारी के आंकड़े क्या कहते हैं?
दो पायलट चरणों के आंकड़े बताते हैं कि जारी किए गए कुल ऑफर्स में से लगभग 33 प्रतिशत ही स्वीकार किए गए, जबकि जॉइन करने वालों की संख्या करीब 6 प्रतिशत तक सीमित रही। बड़ी संख्या में युवाओं ने या तो ऑफर स्वीकार नहीं किए या बीच में इंटर्नशिप छोड़ दी।
विशेषज्ञों के अनुसार, कम वजीफा, एक वर्ष की लंबी अवधि, स्थान की बाध्यता और भविष्य में रोजगार की स्पष्ट गारंटी का अभाव युवाओं की कम भागीदारी के प्रमुख कारण हो सकते हैं। हालांकि, सरकार की ओर से इस पर औपचारिक विस्तृत विश्लेषण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय ने प्रस्तावित बदलावों का नोट व्यय वित्त समिति को सौंपा है। संशोधित प्रारूप को पहले पायलट आधार पर करीब एक लाख प्रशिक्षुओं के साथ परखा जा सकता है।
राज्यों और कंपनियों की भागीदारी
पहले चरण में उत्तर प्रदेश के युवाओं की भागीदारी सबसे अधिक रही, जबकि दूसरे चरण में आंध्र प्रदेश आगे रहा। योजना में कई प्रमुख कंपनियों ने भागीदारी की। इनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड, मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल थीं। कंपनियों की भागीदारी के बावजूद, ऑफर से जॉइनिंग तक का अंतर एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है।
बजट और व्यावहारिकता
वित्त वर्ष 2025-26 में योजना के लिए 10,800 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका एक बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया। आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बजट घटाकर 4,788 करोड़ रुपये कर दिया गया है। बजट में कटौती को सरकार की पुनर्संरचना रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, हालांकि यह भी संकेत देता है कि योजना की मौजूदा गति और प्रभाव को लेकर पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता महसूस की गई है।
जमीनी हकीकत
योजना का मूल उद्देश्य सकारात्मक और महत्वाकांक्षी है, लेकिन पायलट चरण के अनुभव बताते हैं कि केवल अवसर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। युवाओं की अपेक्षाएं, आज के रोजगार बाजार की वास्तविकताएं और कॉरपोरेट सेक्टर की जरूरतें — इन तीनों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वजीफा, अवधि, प्रशिक्षण की गुणवत्ता और रोजगार से जुड़ाव जैसे पहलुओं को स्पष्ट और व्यावहारिक बनाया जाए तो योजना की उपयोगिता बढ़ सकती है। वहीं आलोचकों का कहना है कि जब तक इंटर्नशिप सीधे रोजगार या कौशल प्रमाणन से मजबूती से नहीं जुड़ती, तब तक युवाओं की भागीदारी सीमित रह सकती है।
