February 20, 2026

सनातन प्रतीक से ब्राह्मण समीकरण तक: यूपी की राजनीति में नई हलचल!

0
0
0

दो डिप्टी सीएम, अलग सुर

क्या अंदरूनी असहमति का संकेत ?

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

लखनऊ। माघ मेला में बटुकों की शिखा खींचे जाने के आरोप ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। जो मामला पहले एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान हुई कथित अभद्रता तक सीमित था, वह अब ब्राह्मण अस्मिता, सत्ता संतुलन और राजनीतिक समीकरणों की बड़ी बहस में बदल चुका है।

शिखा से शुरू हुई सियासी लहर

डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने आज (गुरूवार) को 101 बटुकों को अपने आवास पर बुलाकर सम्मानित किया। उनका बयान, “ब्राह्मणों की शिखा खींचने वालों को महापाप लगेगा” सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब ब्राह्मण समाज को लेकर भाजपा के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा तेज है।

इससे पहले डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का बयान भी सामने आया था, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का रुख अपेक्षाकृत प्रशासनिक और संतुलित दिखा। इन अलग-अलग सुरों ने यह संकेत दिया कि मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है।

शंकराचार्य की टिप्पणी से बढ़ी सियासी तपिश

घटना के समय मौजूद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बयान दिया कि भाजपा दो विचारों में बंटी दिखाई देती है। यह टिप्पणी राजनीतिक गलियारों में गूंज रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल बयानबाजी है या 2027 के चुनावों से पहले सामाजिक समीकरणों की नई बिसात बिछ रही है ?

ब्राह्मण राजनीति का पुनर्संतुलन ?

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से सत्ता समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में शिखा जैसे धार्मिक प्रतीक को “सनातन पहचान” बताकर सम्मान देना, राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। विपक्ष ने भी मौके को भुनाने में देर नहीं की। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने ‘पाप’ शब्द पर तंज कसते हुए सरकार को घेरा, वहीं शिवपाल यादव ने इस्तीफे की मांग तक कर दी। विपक्ष इस विवाद को ब्राह्मण असंतोष और कानून-व्यवस्था दोनों से जोड़कर देख रहा है।

सरकार के भीतर संदेशों की परतें

मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने इसे “तिल का ताड़” बताया, जबकि कपिल देव अग्रवाल ने संतों के सम्मान की बात दोहराई। इन बयानों से साफ है कि सरकार के भीतर भावनात्मक, प्रशासनिक और राजनीतिक, तीनों स्तरों पर अलग-अलग संदेश दिए जा रहे हैं।

प्रतीक की राजनीति या वास्तविक अस्मिता ?

माघ मेला की घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि उत्तर प्रदेश में धार्मिक प्रतीक सिर्फ आस्था का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक ऊर्जा का स्रोत भी हैं। ब्राह्मण समाज को लेकर संवेदनशीलता दिखाना एक रणनीतिक कदम हो सकता है, लेकिन असली कसौटी होगी, क्या प्रशासनिक कार्रवाई भी उतनी ही स्पष्ट और पारदर्शी होगी ?

सनातन प्रतीक से उठी यह लहर अब ब्राह्मण समीकरणों की नई दिशा तय करेगी या कुछ दिनों में शांत हो जाएगी, यह आने वाला समय बताएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!