क्या मुफ्त योजनाएं “आर्थिक न्याय” का विकल्प हैं या “राजनीतिक निवेश”??
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मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
नई दिल्ली। देश की चुनावी राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रही “मुफ्त योजनाएं” अब न्यायिक जांच के दायरे में हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों द्वारा बांटी जा रही मुफ्त सुविधाओं पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोक-लुभावन घोषणाएं यदि वित्तीय अनुशासन तोड़ती हैं, तो उसका नुकसान अंततः जनता और अर्थव्यवस्था दोनों को होता है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि जरूरतमंदों की मदद राज्य का दायित्व है, लेकिन बिना ठोस नीति और बजटीय योजना के मुफ्त योजनाओं का अंधाधुंध वितरण विकास को बाधित कर सकता है, खासतौर पर तब, जब कई राज्य पहले से ही घाटे में चल रहे हों। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि सामाजिक सुरक्षा या बेरोजगारी पर खर्च को पारदर्शी और नियोजित व्यय के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि चुनावी प्रलोभन के तौर पर।

अदालत ने संकेत दिया कि यह मुद्दा किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। चुनाव से पहले मुफ्त बिजली, राशन या नकद हस्तांतरण जैसी घोषणाओं पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने पूछा कि क्या इससे निर्भरता की संस्कृति नहीं पनप रही। तमिलनाडु के संदर्भ में अदालत ने कहा कि भुगतान करने में सक्षम लोगों को भी मुफ्त सुविधाएं देना सामाजिक न्याय की मूल भावना के विपरीत हो सकता है।
