कहानी घर-घर की, कहानी मेरे घर की…
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
होली आई है… रंगों का त्योहार। पर मेरे घर यानी मेरे घर में इस बार गुलाल से ज्यादा गुलाटी का ज़ोर है। बाहर चौक-चौराहों पर अबीर है, भीतर बैठकों में ‘अभिरुचि’ बदल रही है। कुछ लोग रंग लगा रहे हैं, तो कुछ रंग बदल रहे हैं। कहते हैं, राजनीति में मौसम नहीं मिज़ाज बदलते हैं। और मिज़ाज बदलते ही कई चेहरों का रंग भी बदल जाता है।
हालिया एक सभा में मंच से यूँ सुर बदले, जैसे किसी ने सहूलियत से मन बदल लिया हो। मंच पर मौजूद कुछ चेहरों पर वही मुस्कान थी जैसे किसी ने मतलब निकलते ही मीत बदल लिया हो। मुस्कान में उतनी ही मिठास थी, जितनी भांग में होती है, थोड़ी देर बाद असली असर दिखता है। घर का वह सिरमौर, जिसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, अब अपनी ही बिसात पर मोहरों की नई जमावट चाहता है। वर्षों पहले जिस ‘मोहरे’ को उसने आगे बढ़ाया था, अब उस मोहरे से उसका मन भरता सा दिख रहा है। वजह ? वक्त की चाल, समीकरणों की गणित, चुनाव आने वाला है।
होली का रंग और राजनीति का ढंग
होली में रंग बदलना मज़ाक है, पर राजनीति में रणनीति नहीं। यहाँ रंग बदलने वाले को गिरगिट नहीं, चाणक्य कहा जाता है। बीते कुछ वर्षों में एक चेहरा “इलाकाई सिपहसालार” के तौर पर उभरा। उसे आगे बढ़ाने वाले वही थे, जो आज उसे बिसारते हुए दिख रहे हैं। सवाल यह नहीं कि बदलाव होगा या नहीं, सवाल यह है कि बदलाव का डर क्यों दिखाया जा रहा है ? क्या कुछ दरक रहा है रिश्तों के बीच या सहूलियतें बदल गई हैं…?
बिसात की बारीक चाल

राजनीति में मोहरों की जगह यूँ ही नहीं बदलती । जब कोई कप्तान अपना ही चुना खिलाडी बदलने की सोचता है, तो समझिए या तो जमीन खिसक रही है या आसमान रंग बदल रहा है। कहते हैं, सत्ता का असली ‘रंगरेज़’ वही है। उसके इशारे पर ही रंग घुलते और उड़ते हैं। लेकिन इस बार चर्चा है कि वह अपने ही रंग के शेड बदलना चाहता है, ताकि चुनावी कैनवास पर तस्वीर फिर उसके मन की हो।
पर सवाल यह भी है, क्या मतदाता के हाथ में भी कुछ है ?
आगामी चुनाव और नई हवा

प्रदेश में चुनावी बिगुल अभी आधिकारिक तौर पर नहीं बजा, लेकिन ढोल की थाप सुनाई देने लगी है। हर गुट अपनी पिचकारी में नया रंग भर रहा है। पुराने रिश्तों पर नए रंग चढ़ाए जा रहे हैं। और कुछ पुराने रंग धोए भी जा रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ चेहरे का नहीं, संदेश का भी है। मतदाता अब सिर्फ रंग नहीं, रंग का कारण पूछ रहा है। होली के बहाने हुई उस सभा ने एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है, क्या यह बदलाव विकास की नई पटकथा है या सिर्फ सत्ता की नई सजावट ?
इशारों में समझिए…
राजनीति की होली में गुलाल से ज्यादा धूल उड़ती है। कभी चेहरा ढँकने के लिए, कभी पहचान छुपाने के लिए। जिले का सिरमौर मन बदल रहा है, या पिछला रंग अब उतना सुहा नहीं रहा। अब देखना यह है कि आने वाले चुनाव में जनता रंगरेज पर भरोसा करती है या पल-पल बदलते शेड्स को नकार देती है।
होली है…पर सावधान रहें, कहीं जनता-जनार्दन बुरा न मान जाए और सहूलियत भरी रंगोली को कहीं अपनी वोट से बिगाड़ न दे।
बाकी… राजनीति की होली में सब कुछ कहा भी जाता है, और कुछ भी नहीं कहा जाता।