डिप्टी रजिस्ट्रार की सख्ती के दावों के बीच सोसायटियों में चुनाव टलते रहे
नोटिस जारी हुए पर कार्रवाई नदारद!
NEWS1UP
एओए/आरडब्लूए डेस्क
गाजियाबाद। अपार्टमेंट ऑनर्स एसोसिएशन (AOA) के चुनावों को लेकर छपी एक खबर में डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय की सख्ती का दावा किया गया है। कहा गया है कि समय से चुनाव न कराने और मतदाता सूची उपलब्ध न कराने वाले पदाधिकारियों पर बायलॉज के तहत पद के दुरुपयोग का केस दर्ज होगा। प्रथम दृष्टया यह बयान प्रशासनिक सजगता और जवाबदेही का संकेत देता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ज़मीनी हकीकत भी यही है ?
शहर की अनेक सोसायटियों में महीनों नहीं, वर्षों से चुनाव प्रक्रिया लंबित है। मतदाता सूची को लेकर विवाद हैं। मॉडल बायलॉज की व्याख्या को लेकर असहमति है। शिकायतें दर्ज हैं, पत्राचार जारी है, नोटिस पर नोटिस जारी हो रहे हैं, परंतु ठोस दंडात्मक कार्रवाई के उदाहरण विरले ही देखने को मिलते हैं।
नोटिस बनाम कार्रवाई
डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय से नोटिस जारी होना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन जब हर मामले में कार्रवाई का परिणाम केवल “अगला नोटिस” बनकर रह जाए, तो यह प्रक्रिया अपनी धार खो देती है। सोसायटी निवासियों का आरोप है कि कार्यालय अक्सर विवादित पक्षों को आमने-सामने छोड़ देता है, मानो यह उनका आपसी मसला हो।
परंतु यह समझना आवश्यक है कि अपार्टमेंट अधिनियम और मॉडल बायलॉज केवल सलाहनामा नहीं हैं, ये विधिक दस्तावेज हैं। इनका पालन सुनिश्चित कराना संबंधित प्राधिकारी की वैधानिक जिम्मेदारी है।
कानून की अस्पष्टता या प्रशासनिक निष्क्रियता ?
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अधिनियम या मॉडल बायलॉज में कुछ प्रावधान अस्पष्ट हैं, इसलिए निर्णय लेने में समय लगता है। यदि ऐसा है, तो उस अस्पष्टता को स्पष्ट करना भी संबंधित प्राधिकारी का दायित्व है। शासनादेश की व्याख्या करना, आवश्यक स्पष्टीकरण जारी करना और एकरूपता सुनिश्चित करना डिप्टी रजिस्ट्रार की भूमिका का हिस्सा है।
यदि कानून की व्याख्या को लेकर भ्रम बना रहे और उस भ्रम का लाभ उठाकर कुछ पदाधिकारी चुनाव टालते रहें, मतदाता सूची रोके रखें या नियमों से खिलवाड़ करें तो यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि विधिक व्यवस्था के प्रति शिथिलता मानी जाएगी।
बढ़ते हौसले, घटता भरोसा
जब शिकायतों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तो नियमों को ताक पर रखने वालों के हौसले बढ़ते हैं। परिणामस्वरूप सोसायटी का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर होता है और सामान्य निवासी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत रह जाते हैं।
चुनाव समय पर कराना, मतदाता सूची पारदर्शी ढंग से उपलब्ध कराना और बायलॉज का अक्षरशः पालन कराना, ये तीनों बिंदु किसी भी एओए की विश्वसनीयता के मूल आधार हैं। यदि इन पर समझौता होता है, तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
जवाबदेही तय करने का समय
डिप्टी रजिस्ट्रार, वैभव कुमार
डिप्टी रजिस्ट्रार वैभव कुमार द्वारा कहा गया है कि “वोटर लिस्ट नहीं देने वाले एओए नपेंगे।” यह स्वागतयोग्य घोषणा है। लेकिन अब जरूरत है कि यह घोषणा कागज से निकलकर जमीन पर दिखाई दे।
डिप्टी रजिस्ट्रार को यह स्पष्ट करना होगा कि-
कितने मामलों में वास्तविक दंडात्मक कार्रवाई हुई ?
कितने पदाधिकारियों पर पद के दुरुपयोग का मुकदमा दर्ज हुआ ?
कितनी सोसायटियों में समयबद्ध चुनाव सुनिश्चित कराए गए ?
जब तक कार्रवाई पारदर्शी और उदाहरणीय नहीं होगी, तब तक नोटिस की औपचारिकता पर सवाल उठते रहेंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि नियमों के निष्पक्ष और दृढ़ अनुपालन से मजबूत होती है। यदि अधिनियम और मॉडल बायलॉज की रक्षा नहीं होगी, तो सोसायटी प्रबंधन व्यक्तिगत वर्चस्व का माध्यम बन जाएगा।
बजाय बड़े-बड़े बयान जारी करने के प्रशासन यह साबित करे कि उसकी सख्ती केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधार का वास्तविक संकल्प है।