वृंदावन में बदली परंपरा की तस्वीर: जब विधवा माताओं ने गोपीनाथ मंदिर में खेली होली!!
वृंदावन ने देखा सामाजिक बदलाव का सतरंगी उत्सव
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
वृंदावन। धर्म और भक्ति की नगरी वृंदावन में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की एक जीवंत मिसाल बन चुकी है। सोमवार को सुप्रसिद्ध गोपीनाथ मंदिर परिसर में जो दृश्य देखने को मिला, वह केवल उत्सव नहीं था, वह सदियों पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार और सम्मान की पुनर्स्थापना का क्षण था। यहां सैकड़ों विधवा माताओं ने अबीर-गुलाल और फूलों के साथ होली खेलकर यह संदेश दिया कि जीवन का रंग किसी एक रिश्ते का मोहताज नहीं होता।
रंगों के साथ लौटी पहचान
समाज में लंबे समय तक विधवा महिलाओं को सफेद वस्त्र, एकांत जीवन और उत्सवों से दूरी की परंपराओं में बांध दिया गया। लेकिन इस बार गोपीनाथ मंदिर में वे परंपराएं टूटती नजर आईं। ‘सुलभ इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर विडोज’ के तत्वावधान में आयोजित इस होली महोत्सव में माताएं न केवल शामिल हुईं, बल्कि उत्सव की केंद्रबिंदु भी बनीं।
जब मंदिर प्रांगण में भजन, होली गीत और रसिया की धुनें गूंजने लगीं, तो माताओं के चेहरों पर वर्षों बाद खुलकर मुस्कान दिखी। गुलाल से सजे चेहरे और भक्ति में डूबा नृत्य यह बता रहा था कि यह केवल होली नहीं, आत्मसम्मान का उत्सव है।

पहल जिसने बदली सोच
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत ‘सुलभ इंटरनेशनल’ के संस्थापक स्वर्गीय बिंदेश्वर पाठक ने की थी। उनका उद्देश्य था कि समाज की मुख्यधारा से कट चुकी विधवा महिलाओं को पुनः सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता दिलाई जाए। आज यह पहल वृंदावन की पहचान बन चुकी है।
संस्था के पदाधिकारियों ने भी माताओं के साथ मिलकर रंग खेला और यह संदेश दिया कि त्योहार सभी के लिए हैं, भेदभाव के लिए नहीं।
मथुरा-वृंदावन की होली: आस्था और उल्लास का संगम
मथुरा-वृंदावन की होली विश्वप्रसिद्ध है। लठमार होली, फूलों की होली और रंगोत्सव यहां की खास पहचान हैं। भगवान कृष्ण और राधा रानी की नगरी में होली केवल पर्व नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु यहां रंगोत्सव का आनंद लेने पहुंचते हैं।
लेकिन इस बार चर्चा का केंद्र वे माताएं रहीं, जो वर्षों तक सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक मानी जाती थीं। जब वे कान्हा की भक्ति में रंगकर एक-दूसरे को गुलाल लगाती दिखीं, तो यह दृश्य मानो संदेश दे रहा था कि आस्था में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता।
सामाजिक बदलाव की बयार
विधवा माताओं का कहना है कि यह उत्सव उनके जीवन में नई ऊर्जा भर देता है। अकेलेपन और सामाजिक दूरी के बीच यह दिन उन्हें अपनत्व का एहसास कराता है। दरअसल, वृंदावन में होली अब केवल परंपरा नहीं, परिवर्तन की पहचान बन चुकी है। यहां रंगों के साथ सोच भी बदली है। गोपीनाथ मंदिर में खेली गई यह होली इस बात का प्रमाण है कि जब समाज साथ खड़ा हो जाए, तो रूढ़ियां स्वतः ही ढह जाती हैं।
