गौतमबुद्ध नगर। ग्रेटर नोएडा की सड़कों पर हाल ही में जो हुआ, उसने ‘पावर SUV’ कल्चर की हकीकत को बेनकाब कर दिया। एक 22 वर्षीय युवक अपनी महिंद्रा थार में शुक्रवार शाम बादलपुर थाना क्षेत्र के धूम मानिकपुर स्थित एक पेट्रोल पंप पर पहुंचा, डीजल भरवाया और ऑनलाइन पेमेंट का बहाना बनाकर फरार होने की कोशिश की। कर्मचारी ने बाइक से पीछा किया तो टक्कर मार दी गई। टक्कर के बाद मोटरसाइकिल वाहन के अगले हिस्से में फंस गई और उसे एनएच-91 पर करीब 5–7 किलोमीटर तक घसीटा जाता रहा। घर्षण से बाइक में आग लग गई, लपटें उठती रहीं और सड़क पर दहशत फैलती रही।
यह सिर्फ एक आपराधिक वारदात नहीं थी, यह उस मानसिकता का आईना है, जिसमें गाड़ी की ताकत को कानून और मानव जीवन से ऊपर समझ लिया जाता है।
पुलिस हिरासत में आरोपी थार जीप चालक हर्ष
‘पावर’ का प्रदर्शन या जिम्मेदारी का परित्याग ?
महिंद्रा थार जैसी हाई-पावर एसयूवी युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई हैं। ऊंची सीटिंग, दमदार इंजन और मजबूत बॉडी आत्मविश्वास देती है। लेकिन यही आत्मविश्वास जब अति-आत्मविश्वास बन जाता है, तो सड़क पर असंतुलन पैदा होता है।
ग्रेटर नोएडा की घटना में भी सवाल यही है, टक्कर के बाद वाहन रोकना मानवीय और कानूनी जिम्मेदारी थी। लेकिन वाहन रोकने के बजाय कई किलोमीटर तक घसीटना क्या दर्शाता है ? यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि कानून की अवहेलना और जीवन के प्रति असंवेदनशीलता है।
सोशल मीडिया का ‘रौब’ और सड़क की ‘रियलिटी’
आजकल सोशल मीडिया पर स्टंट, ओवरस्पीडिंग और ‘रोड डॉमिनेशन’ वाले वीडियो लाइक्स और व्यूज बटोरते हैं। बड़ी गाड़ी, तेज संगीत और खाली सड़क, यह कॉम्बिनेशन कुछ युवाओं को रोमांच देता है। लेकिन असलियत यह है कि सड़क पर हर वाहन बराबर है, चाहे वह साइकिल हो या एसयूवी। बड़ी गाड़ी होने का मतलब बड़ा अधिकार नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी है।
मनोविज्ञान: ऊंची गाड़ी, ऊंचा अहंकार ?
ट्रैफिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारी-भरकम एसयूवी चलाते समय चालक को “सुरक्षा का भ्रम” होता है। उसे लगता है कि वह ज्यादा सुरक्षित है, इसलिए ज्यादा जोखिम ले सकता है। यही सोच छोटे वाहनों और पैदल यात्रियों के लिए खतरनाक बन जाती है।
ग्रेटर नोएडा की घटना में भी यह मानसिकता झलकती है, जहां एक मामूली वित्तीय विवाद ने जानलेवा मोड़ ले लिया।
आरोपी की थार की जाँच करती पुलिस
कानून बनाम क्रियान्वयन
मोटर वाहन अधिनियम में खतरनाक ड्राइविंग, ओवरस्पीडिंग और जान जोखिम में डालने जैसे अपराधों के लिए सख्त प्रावधान हैं। लेकिन क्या प्रवर्तन उतना ही कठोर है ?
बार-बार नियम तोड़ने वालों के लाइसेंस निलंबन की प्रक्रिया तेज होनी चाहिए
हाई-पावर वाहनों के लिए उन्नत ड्राइविंग प्रशिक्षण अनिवार्य करने पर विचार होना चाहिए
सोशल मीडिया पर खतरनाक ड्राइविंग के प्रदर्शन पर निगरानी और दंड की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए
समस्या गाड़ी नहीं, सोच है
एसयूवी खरीदना या चलाना गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब वाहन ‘सुविधा’ से ‘सुविधा’ का प्रतीक बन जाता है। सड़क पर रौब दिखाना, नियमों को चुनौती देना और दूसरों की सुरक्षा को नजरअंदाज करना, यह प्रवृत्ति समाज के लिए खतरा है।
ग्रेटर नोएडा की घटना साफ तौर पर बताती है कि पावर SUV का दुरुपयोग केवल ट्रैफिक उल्लंघन नहीं, बल्कि संभावित आपदा है।
स्टीयरिंग पर ताकत नहीं, परिपक्वता चाहिए
रफ्तार का रोमांच कुछ क्षणों का होता है, लेकिन उसके परिणाम स्थायी हो सकते हैं। पावरफुल गाड़ी चलाना गर्व की बात हो सकती है, पर असली गर्व जिम्मेदार ड्राइविंग में है। यदि युवाओं में ‘पावर SUV’ का ट्रेंड बढ़ रहा है, तो समानांतर रूप से ‘पावरफुल जवाबदेही’ भी बढ़नी चाहिए। वरना सड़कें स्टेटस की जंग का मैदान बनती रहेंगी और हर बार कीमत कोई न कोई निर्दोष चुकाएगा।