टैक्स का बोझ या जवाबदेही की परीक्षा ? गाजियाबाद को पारदर्शिता चाहिए!

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सड़कें टूटी, पानी दूषित…

फिर भी 400% तक टैक्स वृद्धि!

NEWS1UP

 अभिनव त्यागी

गाजियाबाद इन दिनों एक अहम सवाल के साथ खड़ा है, क्या टैक्स बढ़ाना ही विकास का पर्याय है ? या विकास की बुनियाद पहले सुविधाओं की मजबूती से रखी जानी चाहिए ? हाउस टैक्स में 300 से 400 प्रतिशत तक की वृद्धि ने शहर के मध्यम वर्ग को झकझोर दिया है। खासकर राजनगर एक्सटेंशन जैसे क्षेत्रों में यह असंतोष अधिक तीखा है, जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव वर्षों से महसूस किया जा रहा है। लोकतंत्र में कराधान और जन-कल्याण एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। नागरिक टैक्स इसलिए देते हैं ताकि उन्हें साफ पानी, मजबूत सड़कें, प्रभावी ड्रेनेज, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित जीवन मिल सके। लेकिन जब इन बुनियादी अपेक्षाओं पर ही प्रश्नचिह्न लग जाए, तो कर वृद्धि स्वाभाविक रूप से जन-आक्रोश को जन्म देती है।

अधूरी बुनियाद पर भारी बोझ

राजनगर एक्सटेंशन में आज भी गंगा जल की नियमित आपूर्ति हर सोसायटी तक नहीं पहुंच पाई है। भूजल पर बढ़ती निर्भरता और गिरता जल स्तर चिंता का विषय है। कई स्थानों पर पेयजल और सीवर लाइनों के मिश्रण की शिकायतें सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे की ओर इशारा करती हैं। सड़कों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं, गड्ढों से भरी आंतरिक सड़कें आए दिन दुर्घटनाओं का कारण बन रही हैं।

इसके साथ ही सामुदायिक केंद्र, अधिकृत पार्क, सार्वजनिक परिवहन, पोस्ट ऑफिस और कूड़ा निस्तारण जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव नागरिकों की नाराजगी को और गहरा करता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब आधारभूत संरचना अधूरी है, तो कर में इतनी तीव्र वृद्धि का औचित्य क्या है?

कर निर्धारण का विवादित आधार

गाजियाबाद नगर निगम द्वारा सड़कों की चौड़ाई और डीएम सर्किल रेट के आधार पर कर निर्धारण का नया फार्मूला लागू किया गया है। प्रशासन का तर्क है कि शहर के समग्र विकास के लिए राजस्व सुदृढ़ीकरण आवश्यक है। यह तर्क सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं है, कोई भी शहर बिना संसाधनों के विकसित नहीं हो सकता।

लेकिन यहां मूल प्रश्न प्रक्रिया और प्राथमिकता का है। क्या कर वृद्धि से पहले जनसुनवाई, पारदर्शिता और चरणबद्ध कार्ययोजना प्रस्तुत की गई ? क्या नागरिकों को यह भरोसा दिलाया गया कि बढ़ा हुआ राजस्व सीधे उन्हीं क्षेत्रों में व्यय होगा जहां सुविधाएं अधूरी हैं ? यदि संवाद की कमी रही है, तो असंतोष भी स्वाभाविक है।

जनप्रतिनिधियों की कसौटी

लोकतंत्र में चुने हुए प्रतिनिधि जनता और प्रशासन के बीच सेतु होते हैं। जब नागरिकों को लगे कि उनकी आवाज अनसुनी की जा रही है, तो सबसे पहले उंगली जनप्रतिनिधियों की ओर उठती है। सांसद, विधायक और पार्षद, सभी के लिए यह समय परीक्षा का है। सदन में विरोध दर्ज कराना पर्याप्त नहीं; जमीनी स्तर पर समाधान की पहल अपेक्षित है।

यदि स्थानीय निकाय की नीतियां जनता को असंतुलित लग रही हैं, तो जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे पारदर्शी समीक्षा, राहत उपाय और चरणबद्ध सुधार की दिशा में ठोस पहल करें। मौन या औपचारिक बयानबाजी से भरोसा बहाल नहीं होगा।

न्यायालय और प्रशासन के बीच फंसी जनता

हाउस टैक्स वृद्धि के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं, पर तकनीकी आधारों पर तत्काल व्यापक राहत नहीं मिल सकी। इससे यह स्पष्ट है कि समाधान अंततः प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही निकलेगा।

इस विवाद का समाधान टकराव में नहीं, संवाद में है। कुछ ठोस कदम तत्काल उठाए जा सकते हैं, मसलन, कर वृद्धि की स्वतंत्र ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्ट, चरणबद्ध और युक्तिसंगत दर निर्धारण, आपत्ति निस्तारण के लिए प्रभावी तंत्र, बढ़े हुए राजस्व के उपयोग की वार्ड-वार पारदर्शी जानकारी और आधारभूत सुविधाओं के लिए समयबद्ध कार्ययोजना।

लेखक ‘फेडरेशन ऑफ राजनगर एक्सटेंशन सोसाइटीज’ के वरिष्ठ सचिव हैं

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