जातीय जनगणना पर बवाल तेज! अखिलेश यादव के MLA ने सरकार को घेरा

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पहले चरण में मकान सूचीकरण पर फोकस

लेकिन जातीय आंकड़ों की टाइमिंग पर उठे राजनीतिक सवाल

NEWS1UP

पॉलिटिकल डेस्क

लखनऊ। देश में जनगणना 2027 की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी है, और इस बार यह कई मायनों में खास है, पूरी तरह डिजिटल प्रणाली, स्व-गणना (Self Enumeration) का विकल्प और दो चरणों में डेटा संग्रह। हालांकि, इस तकनीकी बदलाव के साथ-साथ अब राजनीतिक बहस भी तेज़ होती जा रही है, खासकर जातीय आधार पर डेटा जुटाने के मुद्दे पर।

उत्तर प्रदेश में इस बहस को नया आयाम तब मिला जब समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने जनगणना के पहले चरण में जातीय प्रश्न शामिल न किए जाने पर सवाल उठाए। उनका तर्क है कि अगर शुरुआत से ही जातीय आंकड़े जुटाए जाते, तो नीति निर्माण अधिक सटीक और प्रभावी हो सकता था।

डिजिटल जनगणना: व्यवस्था में बड़ा बदलाव

इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित है। पहले चरण में मकानों का सूचीकरण और आवास संबंधी जानकारी जुटाई जा रही है, जिसमें कुल 33 प्रश्न शामिल हैं। डेटा संग्रह से लेकर सत्यापन और निगरानी तक की पूरी प्रक्रिया तकनीक के जरिए संचालित होगी।

खास बात यह है कि नागरिकों को पहली बार स्व-गणना का विकल्प दिया गया है, जिससे वे खुद ऑनलाइन अपने विवरण दर्ज कर सकते हैं। इसे प्रशासनिक पारदर्शिता और सुविधा की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

यूपी में तय कार्यक्रम

उत्तर प्रदेश में जनगणना की शुरुआत 7 मई से होगी।

7 मई – 21 मई: स्व-गणना (Self Enumeration)

22 मई – 20 जून: घर-घर जाकर डेटा संग्रह

इस दौरान अधिकारी मकानों के सूचीकरण के लिए निर्धारित प्रश्नों के उत्तर जुटाएंगे।

जातीय जनगणना: समय का सवाल या प्राथमिकता का?

विवाद का केंद्र यह है कि जातीय आधार पर गणना दूसरे चरण में प्रस्तावित है। समाजवादी पार्टी का मानना है कि इसे पहले चरण में ही शामिल किया जाना चाहिए था, ताकि डेटा एकसाथ और समग्र रूप में उपलब्ध हो सके।

दूसरी ओर, प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो चरणबद्ध प्रक्रिया का उद्देश्य डेटा संग्रह को व्यवस्थित और त्रुटिरहित बनाना है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि पहले बुनियादी ढांचा (मकान, परिवार) तैयार करना और फिर सामाजिक-आर्थिक विवरण जोड़ना एक व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।

बड़ी तस्वीर: तकनीक बनाम राजनीति

इस पूरी बहस में एक दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आता है, जहां एक तरफ सरकार डिजिटल और व्यवस्थित जनगणना की दिशा में कदम बढ़ा रही है, वहीं राजनीतिक दल इसके सामाजिक प्रभाव और उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं।

असल मुद्दा केवल “जातीय जनगणना हो या न हो” का नहीं, बल्कि यह भी है कि कब और कैसे हो, ताकि डेटा नीतियों को वास्तव में प्रभावी बना सके।

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