गाजियाबाद हाउस टैक्स विवाद: 300–400% बढ़ाया टैक्स, अब 40% छूट! आखिर माजरा क्या है ?

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सदन का निर्णय एक ओर, निगम की वसूली दूसरी ओर 

आखिर किसकी चल रही है ?

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। शहर में इन दिनों हाउस टैक्स की दरों में हुई बेतहाशा वृद्धि को लेकर जनाक्रोश अपने चरम पर है। मामला अब केवल टैक्स बढ़ोतरी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह नगर निगम की कार्यप्रणाली, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और जनता के हितों की अनदेखी जैसे गंभीर सवालों के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।

आमरण अनशन पर बैठे अवधेश शर्मा

05 मार्च से व्यापार मंडल के अध्यक्ष अवधेश शर्मा द्वारा आमरण अनशन शुरू किए जाने से यह मुद्दा एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। दूसरी ओर आज नगर निगम की बोर्ड बैठक भी प्रस्तावित है, जिसका एजेंडा पहले ही जारी हो चुका है। ऐसे में शहर की निगाहें इस बैठक पर टिकी हुई हैं।

300–400 प्रतिशत बढ़ोतरी से शुरू हुआ विवाद

बढ़ी टैक्स दरों के विरोध में प्रदर्शन करते शहरवासी (फाइल फोटो)

दरअसल पूरे विवाद की शुरुआत 9 अक्टूबर 2024 को हुई नगर निगम की बोर्ड बैठक से मानी जा रही है। उस बैठक में हाउस टैक्स की दरों में लगभग 300 से 400 प्रतिशत तक वृद्धि का प्रस्ताव लाया गया था। सदन में इस प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और अंततः पार्षदों ने इसे खारिज कर दिया।

इसके बाद 7 मार्च 2025 को पुनः बोर्ड बैठक बुलाई गई। इस बैठक में पहले के निर्णय की पुष्टि की गई, लेकिन यहीं से घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। यह तर्क सामने रखा गया कि शासन की ओर से टैक्स दरें बढ़ाने संबंधी पत्र प्राप्त हुआ है। इसी आधार पर प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया।

हाई कोर्ट की शरण में पहुंचे पूर्व पार्षद

बढ़ी हुई दरों पर वसूली का विरोध करते हुए मई 2025 में पूर्व पार्षदों का एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें राजेंद्र त्यागी, अनिल स्वामी और हिमांशु मित्तल शामिल थे, इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में पहुंचा। याचिका में महापौर, नगर निगम के मुख्य कर निर्धारण अधिकारी तथा शासन के दो वरिष्ठ अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया। याचिकाकर्ताओं का मुख्य आरोप था कि टैक्स दरों में वृद्धि सदन की स्वीकृति के विपरीत की गई, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है।

घोषणा निरस्तीकरण की, वसूली जारी

File photo

जून 2025 में हुई एक अन्य बोर्ड बैठक में महापौर ने बढ़ी हुई दरों को निरस्त करने की घोषणा की। परंतु विडंबना यह रही कि इसके बावजूद नगर निगम द्वारा हाउस टैक्स की वसूली बढ़ी हुई दरों पर ही जारी रही। निगम प्रशासन के इस रवैये को शहर के कई सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों ने तानाशाही प्रवृत्ति करार दिया। परिणामस्वरूप शहर की सड़कों पर धरना, प्रदर्शन और विरोध सभाओं का दौर शुरू हो गया।

कोर्ट का फैसला और नए सवाल

करीब एक वर्ष तक चले इस विवाद में 25 फरवरी 2026 को हाई कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि नगर निगम द्वारा अपनाई गई मिनिमम मंथली रेंट रेट (MMRR) की प्रक्रिया विधिसम्मत है। हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनका मूल सवाल यह था कि जब सदन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया था तो फिर टैक्स दरें कैसे बढ़ाई गईं। अदालत का निर्णय आने के बाद भी यह प्रश्न शहर की चर्चा का विषय बना हुआ है।

आंदोलन फिर तेज

आमरण अनशन स्थल पर पुलिस की मौजूदगी

5 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गाजियाबाद दौरे के दिन ही व्यापार मंडल अध्यक्ष अवधेश शर्मा ने आमरण अनशन शुरू कर आंदोलन को नया स्वर दे दिया। शाम होते-होते शहर की कई आवासीय कॉलोनियों ने भी इस आंदोलन को समर्थन देते हुए बढ़ी हुई दरों पर टैक्स जमा न करने की घोषणा कर दी। इससे स्पष्ट है कि मुद्दा केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं, बल्कि आम गृहकरदाताओं की चिंता का विषय बन चुका है।

बोर्ड बैठक के एजेंडे पर उठे सवाल

आज होने जा रही बोर्ड बैठक के एजेंडे में एक महत्वपूर्ण बिंदु का न होना चर्चा का विषय बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार पिछली बोर्ड बैठक की कार्यवाही (मिनिट्स) एजेंडे में साझा नहीं की गई है। नगर निगम की प्रक्रिया में यह एक असामान्य स्थिति मानी जा रही है, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

40 प्रतिशत छूट का प्रस्ताव ?

पूर्व पार्षद हिमांशु मित्तल ने बताया कि  आज की बैठक में निगम आवासीय भवनों पर 40 प्रतिशत तक छूट देने का प्रस्ताव ला सकता है। यहीं से कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। मित्तल के अनुसार याचिका में भी गृहकरदाताओं को 40 प्रतिशत तक राहत देने की मांग उठाई गई थी। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि हाई कोर्ट के निर्णय के बाद निगम छूट देने पर विचार कर सकता है, तो फिर जनता की मांग और हितों को देखते हुए दरों में युक्तिसंगत कटौती पहले क्यों नहीं की गई ?

जनप्रतिनिधियों की परीक्षा

लगभग एक वर्ष से चले आ रहे इस हाई-वोल्टेज विवाद ने नगर निगम के जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। पार्षदों से लेकर जिले के शीर्ष राजनीतिक प्रतिनिधियों तक को जनता अपनी कसौटी पर कस रही है।

फिलहाल स्थिति यह है कि जनता के बीच जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर असंतोष और अविश्वास की भावना साफ दिखाई दे रही है।

आज की बोर्ड बैठक केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। यह बैठक तय करेगी कि नगर निगम जनता की आवाज़ सुनने को तैयार है या नहीं। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि जनप्रतिनिधि शहर के करदाताओं के साथ खड़े हैं या प्रशासनिक फैसलों के पीछे खामोश दर्शक बने रहेंगे।

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