महागुनपुरम एओए चुनाव में बड़ा फर्जीवाड़ा ? फर्स्ट ओनर न होते हुए भी अध्यक्ष !

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मतदाता सूची पर उठे गंभीर सवाल, आमसभा में हंगामा

पुलिस तक पहुंचा मामला

पड़ोसी सोसाइटी के ऑडिट ने भी बढ़ाई चिंता

NEWS1UP

एओए/आरडब्लूए डेस्क

गाजियाबाद। एनएच-24 स्थित महागुनपुरम सोसाइटी में एओए चुनाव को लेकर कथित फर्जीवाड़े का मामला अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। आरोप है कि सोसाइटी के मौजूदा अध्यक्ष प्रसून श्रीवास्तव संबंधित फ्लैट के प्राथमिक मालिक (फर्स्ट ओनर) नहीं हैं, इसके बावजूद वे न केवल चुनाव लड़े बल्कि अध्यक्ष पद तक पहुंच गए। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो पूरी चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो सकता है।

इसी मुद्दे को लेकर रविवार को सोसाइटी में बुलाई गई आमसभा में माहौल अचानक गर्मा गया। जनरल सेक्रेटरी डॉ. सुरजीत सिंह द्वारा बुलाई गई इस बैठक में करीब साठ निवासी मौजूद थे। जैसे ही मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और पात्रता का मुद्दा उठा, दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। कुछ ही देर में स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि एक पक्ष ने मीटिंग से वाकआउट कर दिया। बाद में दोनों पक्षों द्वारा पुलिस को लिखित शिकायत दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

दरअसल सोसाइटी में 11 जनवरी को एओए के चुनाव यूपी अपार्टमेंट एक्ट और मॉडल बायलॉज़ के प्रावधानों के तहत कराए गए थे। चुनाव में दस सदस्य निर्वाचित हुए थे और इन्हीं में से प्रसून श्रीवास्तव को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया था। लेकिन अब सामने आए तथ्यों ने इस चुनाव की वैधता को ही सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।

सोसाइटी के बायलॉज़ स्पष्ट करते हैं कि केवल फ्लैट का प्राथमिक मालिक (फर्स्ट ओनर) ही मतदाता सूची में शामिल हो सकता है और एओए चुनाव लड़ सकता है। सह-मालिक (को-ओनर) को न तो मतदान का अधिकार है और न ही चुनाव लड़ने की अनुमति। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं को प्राथमिक मालिक दर्शाकर चुनाव लड़ा है तो यह सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन और चुनावी प्रक्रिया के साथ गंभीर छल माना जाएगा।

मामले को और पेचीदा बनाती है एक और तथ्यात्मक कड़ी। जानकारी के अनुसार प्रसून श्रीवास्तव पिछले दो वर्षों से एओए बोर्ड का हिस्सा रहे हैं। उस दौरान हुए चुनाव प्रशासन द्वारा नामित निर्वाचन अधिकारी की निगरानी में कराए गए थे और उन चुनावों की मतदाता सूची में भी उनका नाम फर्स्ट ओनर के रूप में दर्ज बताया जाता है।

इतना ही नहीं, वे सोसाइटी में कोषाध्यक्ष जैसे संवेदनशील पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। ऐसे में अब निवासियों के बीच यह सवाल भी उठने लगे हैं कि यदि पात्रता ही विवादित थी तो उनके कार्यकाल में लिए गए वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता की भी जांच होनी चाहिए।

चुनाव कराने वाली समिति के एक सदस्य ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि मतदाता सूची तैयार करना उस समय के एओए बोर्ड की जिम्मेदारी होती है। बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराई गई सूची के आधार पर ही चुनाव कराए गए थे, तब सूची में प्रसून को प्राथमिक ओनर ही लिखा हुआ था। चूंकि प्रसून श्रीवास्तव पहले भी बोर्ड में रह चुके थे और उनके चुनाव प्रशासन की निगरानी में हुए थे, इसलिए उस समय किसी प्रकार की शंका नहीं हुई।

हालांकि निवासियों का एक वर्ग इस तर्क से संतुष्ट नहीं है। उनका कहना है कि यदि मतदाता सूची में ही गड़बड़ी रही है तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरी चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है।

इस बीच निवासियों ने पूरे मामले की शिकायत सहायक पुलिस आयुक्त को सौंप दी है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। पुलिस जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मतदाता सूची में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है या नहीं।

दिलचस्प बात यह भी है कि हाल के दिनों में सोसाइटी प्रबंधन में कथित फर्जीवाड़े के अन्य मामले भी चर्चा में आने लगे हैं। महागुनपुरम के निकट स्थित एक अन्य सोसाइटी में हाल ही में हुए ऑडिट में भी कुछ लोगों के फर्जी तरीके से बोर्ड में बने रहने के संकेत सामने आए हैं। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि कुछ जगहों पर सोसाइटी प्रबंधन में नियमों को दरकिनार कर पदों पर काबिज रहने की प्रवृत्ति पनप रही है।

अब सबकी नजर पुलिस जांच पर टिकी है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई गई तो यह मामला केवल एक सोसाइटी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सोसाइटी चुनावों की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। वहीं निवासी साफ कह रहे हैं कि सोसाइटी प्रबंधन में नियमों का पालन और जवाबदेही सुनिश्चित होना ही हजारों परिवारों के हितों की वास्तविक सुरक्षा है।

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