गौर कैस्केड्स में चुनाव से पहले ही ‘कानून हारा’!

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फर्स्ट ओनर नियम को दरकिनार कर को-ओनर्स को मैदान में उतारने का फरमान, मॉडल बायलॉज को खुली चुनौती

NEWS1UP

एओए/आरडब्ल्यूए डेस्क

गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन की चर्चित सोसाइटी गौर कैस्केड्स में एओए चुनाव की घोषणा के साथ ही एक बार फिर नियम-कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आ गया है। चुनाव समिति द्वारा जारी कार्यक्रम ने जहां चुनावी प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया है, वहीं इसके साथ ही पूरे चुनाव की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

जारी शेड्यूल के मुताबिक, 19 अप्रैल को मतदान होगा। 5 अप्रैल नामांकन की अंतिम तिथि तय की गई है, जबकि 8 अप्रैल को नामांकन वापसी और जांच के बाद उम्मीदवारों की सूची जारी की जाएगी। 9 अप्रैल से 17 अप्रैल दोपहर 3 बजे तक प्रचार की अनुमति दी गई है। कागजों में यह प्रक्रिया भले व्यवस्थित दिखे, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।

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सबसे बड़ा विवाद चुनाव समिति के उस आदेश को लेकर खड़ा हुआ है, जिसमें सेकंड, थर्ड और अन्य संयुक्त फ्लैट ओनर्स (को-ओनर्स) को भी चुनाव लड़ने की खुली छूट दे दी गई है। यह फैसला सीधे-सीधे मॉडल बायलॉज 2011  के मूल प्रावधानों के खिलाफ जाता है।

नियम साफ कहते हैं कि मतदान का अधिकार केवल “फर्स्ट ओनर” के पास होता है। ऐसे में जब वोट देने का अधिकार ही प्रथम स्वामी तक सीमित है, तो चुनाव लड़ने की पात्रता को मनमाने तरीके से बढ़ाना किस कानून के तहत वैध ठहराया जा सकता है ? चुनाव समिति का यह कदम न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया को संदिग्ध बनाने की सुनियोजित कोशिश भी प्रतीत होता है।

यह मामला सिर्फ तकनीकी गलती नहीं, बल्कि कानून को चुनौती देने की खुली हिमाकत है। जिस तरह से बिना किसी वैधानिक आधार के संयुक्त मालिकों को चुनाव मैदान में उतारने की छूट दी गई है, वह यह दर्शाता है कि सोसाइटी प्रबंधन में बैठे लोग नियमों को अपनी सुविधा के हिसाब से तोड़-मरोड़ने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे।

गाजियाबाद की सोसाइटियों में लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं यह साबित कर रही हैं कि यहां कानून का डर लगभग समाप्त हो चुका है। नियमों को दरकिनार कर “मनमानी का मॉडल” लागू किया जा रहा है, जहां पारदर्शिता और वैधता की जगह जुगाड़ और दबाव की राजनीति हावी होती जा रही है।

अब इस पूरे मामले में सबसे अहम भूमिका डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय की बनती है। क्या वह इस स्पष्ट उल्लंघन पर सख्त रुख अपनाते हुए चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाएगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह हीला-हवाली कर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा नजरअंदाज कर दिया जाएगा, यह देखने वाली बात होगी।

हाल ही में एसडीएम कोर्ट के एक फैसले ने साफ कर दिया है कि एओए चुनाव में यूपी अपार्टमेंट एक्ट 2010 और मॉडल बायलॉज 2011 सर्वोपरि हैं और इनके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसके बावजूद गौर कैस्केड्स में जो हो रहा है, वह सीधे-सीधे न्यायिक दिशा-निर्देशों को ठेंगा दिखाने जैसा है।

अगर इस तरह की खुली अनियमितताओं पर तुरंत और कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला एक खतरनाक मिसाल बन जाएगा, जहां कानून सिर्फ किताबों में रह जाएगा और जमीनी स्तर पर “जिसकी लाठी, उसकी भैंस” वाला सिस्टम हावी हो जाएगा।

1 thought on “गौर कैस्केड्स में चुनाव से पहले ही ‘कानून हारा’!

  1. नमस्कार ,
    निवेदन है कि आज नियमों की अनदेखी bhavisye में society के लिए हानिकारक होती है । यदि किसी को कोई शक है तो अन्य societies से पता कर सकते है । लगातार societies को नोटिस जारी हो रहे है जिसका खामियाजा societies को ही भुगतना पड़ता है । कोई भी जांच होती है जांच का भुगतान भी societies को ही देना होता है । इसलिए नियम कानून या bye-laws का अनदेखी करना भारी पाएगा ।
    धन्यवाद ।

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