नम आंखों के बीच हरीश राणा को अंतिम विदाई, गमगीन माहौल में थम गए लम्हे !!
सैकड़ों लोगों ने दी भावभीनी विदाई
दो मिनट के मौन में गूंज उठा जीवन का दर्द
कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान कर हरीश को बना दिया अमर
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
नई दिल्ली। कभी जीवन से भरे सपनों के साथ जीने वाला एक युवक, 13 साल तक बिस्तर पर खामोश पड़ा रहा और फिर चुपचाप इस दुनिया को अलविदा कह गया। गाजियाबाद के हरीश राणा की अंतिम यात्रा सिर्फ एक विदाई नहीं थी, वह दर्द, संवेदना और मानवता की एक गहरी कहानी बन गई।
ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट पर आज करीब 9 बजकर 30 मिनट पर जब हरीश राणा को अंतिम विदाई दी गई, तो हर आंख नम थी। सैकड़ों लोग भारी मन से वहां मौजूद थे। किसी के होंठ खामोश थे, तो किसी की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। दो मिनट का मौन मानो उस 13 साल लंबे संघर्ष की गवाही दे रहा था, जिसे हरीश ने बिना कुछ कहे सहा।

इस मौके पर ब्रह्मकुमारी संस्था के सदस्य, कांग्रेस के यूपी अध्यक्ष अजय राय और सामाजिक कार्यकर्ता दीपांशु मित्तल सहित कई लोग मौजूद रहे। लेकिन उस भीड़ में सबसे ज्यादा भारी दिल शायद उनके माता-पिता का था, जिन्होंने अपने बेटे को हर दिन जीते हुए भी खोया, और आज सच में विदा कर दिया।
एक फैसला, जिसने दर्द को बना दिया उम्मीद
हरीश के जाने के बाद भी उनकी कहानी खत्म नहीं हुई। बल्कि यहीं से शुरू हुई एक नई उम्मीद। जिस बेटे को 13 साल तक सांसों के सहारे जिंदा रखा, उसी के माता-पिता ने अपने आंसुओं को ताकत बनाकर एक ऐसा फैसला लिया, जिसने हर किसी का दिल छू लिया, उन्होंने हरीश के अंग दान कर दिए।
एम्स से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हरीश के दोनों कॉर्निया और हार्ट वाल्व जैसे महत्वपूर्ण टिश्यू दान किए गए। यानी, हरीश अब भी जिंदा हैं, किसी की आंखों की रोशनी बनकर, किसी की धड़कनों में बसकर। यह फैसला आसान नहीं था। जिस शरीर को मां-बाप ने इतने सालों तक संभाला, उसी को किसी और की जिंदगी के लिए सौंप देना, यह सिर्फ हिम्मत नहीं, बल्कि इंसानियत की सबसे ऊंची मिसाल है।
13 साल का सन्नाटा
साल 2013 चंडीगढ़ के एक हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश की जिंदगी जैसे ठहर गई। सिर में गंभीर चोट लगी और वह कोमा में चले गए। दिन, महीने, साल, 13 साल गुजर गए, लेकिन हरीश की आंखें कभी नहीं खुलीं।
हाल ही में 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि उन्हें पैलिएटिव केयर में रखा जाए और एक सम्मानजनक प्रक्रिया के तहत उनका इलाज बंद किया जाए, ताकि उनकी गरिमा बनी रहे। और फिर, मंगलवार शाम 4 बजकर 10 मिनट पर, हरीश ने अंतिम सांस ली।
खामोशी जो बहुत कुछ कह गई
हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी हर उस दिल में जिंदा रहेगी, जो इंसानियत को समझता है। उनकी खामोशी ने सिखा दिया कि जिंदगी सिर्फ जीने का नाम नहीं, बल्कि जाने के बाद भी दूसरों को जीवन देने का नाम है।

अत्यंत दुखद , Bhagwan से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देने की कृपा करे । साथ ही परिवारजनों को इस कष्ट को सहने की शक्ति प्रदान करे । ओम शांति ओम ।