हम-तुम रोड: वादों की रोशनी बुझी, डर और हादसों का अंधेरा कायम
राजनगर एक्सटेंशन की सात सोसायटियां हर दिन दहशत में
सिस्टम की चुप्पी, लोगों की जान पर भारी
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। “कहाँ तो तय था चरागां हर घर के लिए, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।” दुष्यंत कुमार का यह शेर अब राजनगर एक्सटेंशन की “हम-तुम रोड” की सच्चाई बन चुका है, एक ऐसी सड़क, जहां हर दिन ज़िंदगी और मौत के बीच संतुलन बनाकर लोग गुजरने को मजबूर हैं।
जिस इलाके को आधुनिक सुविधाओं का सपना दिखाकर बसाया गया, वहां आज बुनियादी सड़क तक नसीब नहीं। चमकते ब्रोशर और बड़े-बड़े वादे अब धूल, गड्ढों और खून से सने हादसों में तब्दील हो चुके हैं।
हर सफर में मौत का साया

राज विलास, निलाया ग्रीन, मोती रेजीडेंसी, महक जीवन, मिडोज विस्टा, संचार आर्केड और दियाग्रीन, इन सात सोसायटियों के हजारों परिवारों के लिए यह सड़क कोई विकल्प नहीं, मजबूरी है। यह सड़क अब तक दर्जनों लोगों की जान ले चुकी है। कई परिवार अपनों को खो चुके हैं, तो कई लोग आज भी अपंगता के साथ जिंदगी काट रहे हैं।
बारिश में यह रास्ता दलदल बन जाता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि सूखे मौसम में भी यह सड़क किसी जाल से कम नहीं, जहां हर गड्ढा एक संभावित हादसा है। दिन-रात दौड़ते भारी डंपर, ट्रक और रेडीमिक्स कंक्रीट के वाहन इस खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं। स्कूल बसों में बैठे बच्चों की सलामती हर दिन एक दुआ बन जाती है।
चीखती आवाज़ें, बहरे सिस्टम
निवासियों ने हर रास्ता अपनाया, शिकायतें, प्रदर्शन, ज्ञापन, धरने… यहाँ तक कि “बुद्धि-शुद्धि यज्ञ” भी। मानवाधिकार आयोग के नोटिस भी बेअसर रहे। मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायतों का ढेर है, लेकिन निस्तारण सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है।
विकास के नाम पर भेदभाव ?
एक तरफ हजारों करोड़ की एरोसिटी और अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम जैसी परियोजनाएं तेज़ी से आगे बढ़ती हैं, तो दूसरी तरफ कुछ किलोमीटर की इस सड़क के लिए सालों का इंतजार, यह विरोधाभास अब लोगों को चुभने लगा है।
GDA ने अप्रैल में काम शुरू करने का दावा किया था, लेकिन ज़मीन पर सन्नाटा पसरा है।
निवासियों का फूटा गुस्सा: “अब बस !”
संचार आर्केड की विजया देवी कहती हैं,

हर दिन घर से निकलना डरावना हो गया है। बच्चे सकुशल लौट आएं, यही सबसे बड़ी राहत होती है। क्या हम इंसान नहीं हैं ?
मिडोज विस्टा के ललित शर्मा ने तल्खी के साथ कहा,

यह सड़क नहीं, सिस्टम की नाकामी का जिंदा सबूत है। हमने हर स्तर पर आवाज उठाई, लेकिन सुनवाई शून्य है।
राज विलास की श्वेता वर्मा का दर्द साफ झलकता है,

सपनों का घर अब डर का घर बन गया है। हर दिन एक अनहोनी का डर साथ चलता है।
मोती रेजीडेंसी के अनिल शर्मा ने सवाल उठाया,

जब बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए फटाफट फैसले हो सकते हैं, तो इस सड़क के लिए इतनी बेरुखी क्यों ? क्या हमारी जान की कोई कीमत नहीं ?
दियाग्रीन के जे.एस. भड़ाना ने चेतावनी दी,

अब सहनशक्ति जवाब दे रही है। अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन और उग्र होगा।
निलाया ग्रीन के मनजीत चौहान ने आक्रोश जताते हुए कहा,

यह सड़क नहीं, मौत का जाल है। हर दिन कोई न कोई हादसा होता है। प्रशासन सिर्फ तमाशा देख रहा है। अगर यही हाल रहा, तो लोग सड़क पर उतरने को मजबूर होंगे।
भूख हड़ताल का ऐलान: आर-पार की लड़ाई

महक जीवन सोसायटी के सुनील कुमार अग्रवाल ने अब संघर्ष को निर्णायक मोड़ दे दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि यदि अप्रैल में सड़क चौड़ीकरण और सुरक्षित निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो वह 1 मई से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठेंगे, और इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और सरकार की होगी।
सिस्टम से सीधे सवाल
कितनी और जानें जाएंगी, तब जागेगा प्रशासन ?
क्या विकास सिर्फ घोषणाओं और विज्ञापनों तक सीमित है ?
आखिर कब खत्म होगा “हम-तुम रोड” का यह खौफनाक सफर ?
