डेढ़ करोड़ के समझौते से पलटी पत्नी, SC सख्त: 23 साल पुरानी शादी खत्म

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अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल, घरेलू हिंसा केस भी रद्द

मध्यस्थता पर कड़ा संदेश

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

नई दिल्ली। पति-पत्नी के एक लंबे वैवाहिक विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अहम और सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता से हुए “पूर्ण और अंतिम समझौते” से पीछे हटना न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करता है। अदालत ने न केवल विवाह को समाप्त किया, बल्कि 23 साल बाद दर्ज कराए गए घरेलू हिंसा के मामले को भी निरस्त कर दिया।

यह मामला एक ऐसे दंपत्ति से जुड़ा है, जिनकी शादी वर्ष 2000 में हुई थी। वर्ष 2023 में पति ने तलाक की अर्जी दी, जिसके बाद मामला फैमिली कोर्ट से मध्यस्थता में पहुंचा। यहां दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से तलाक और सभी विवादों के निपटारे पर सहमति जताई थी।

समझौते से पलटी पत्नी, कोर्ट नाराज

मध्यस्थता में तय समझौते के तहत पति ने पत्नी को करीब डेढ़ करोड़ रुपये, 14 लाख रुपये (कार के लिए) और कुछ ज्वेलरी देने पर सहमति दी थी। वहीं पत्नी ने संयुक्त बिजनेस खाते से 2.5 करोड़ रुपये पति को लौटाने की बात मानी थी।

हालांकि, अंतिम आदेश से ठीक पहले पत्नी अपने रुख से पलट गई और न केवल तलाक की सहमति वापस ले ली, बल्कि पति के खिलाफ घरेलू हिंसा (DV Act) का मामला भी दर्ज करा दिया।

इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि-

बिना ठोस कारण के समझौते से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।

120 करोड़ की ज्वेलरी का दावा पड़ा भारी

सुनवाई के दौरान पत्नी ने दावा किया कि समझौते के अलावा पति ने 120 करोड़ रुपये की ज्वेलरी और 50 करोड़ रुपये के सोने के बिस्किट लौटाने का वादा किया था, जिसे टैक्स बचाने के लिए लिखित में नहीं रखा गया। इस दलील पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के दावे न्याय व्यवस्था के प्रति गंभीर असम्मान दर्शाते हैं और इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल, शादी खत्म

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय विश्नोई की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए विवाह को भंग कर दिया। अदालत ने माना कि यह विवाह पूरी तरह टूट चुका है और इसे बनाए रखना न्यायसंगत नहीं होगा। साथ ही, घरेलू हिंसा का मामला भी रद्द कर दिया गया।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

आपसी सहमति से तलाक के मामलों में अंतिम आदेश से पहले सहमति वापस लेना संभव है, लेकिन

यदि सभी विवादों का “पूर्ण और अंतिम समझौता” हो चुका है, तो उससे मुकरना उचित नहीं

केवल धोखाधड़ी, दबाव या शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में ही समझौते से पीछे हटना मान्य होगा

बिना कारण समझौता तोड़ने पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए

क्यों है फैसला महत्वपूर्ण

यह फैसला मध्यस्थता (मेडिएशन) प्रक्रिया की विश्वसनीयता को मजबूत करता है। कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि समझौते को हल्के में लेकर बार-बार पलटना न्यायिक व्यवस्था के दुरुपयोग के समान है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में एक मिसाल बनेगा, जहां पक्षकार समझौते के बाद अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करते हैं।

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