मानव तस्करी के मामलों में अब कोई देरी या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी: राजीव कृष्ण
NEWS1UP
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मानव तस्करी के खिलाफ अब लड़ाई सिर्फ आदेशों की नहीं, बल्कि जवाबदेही और संवेदनशीलता की बनती जा रही है। पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्ण के नए निर्देशों ने इस दिशा में एक ठोस पहल की है। उन्होंने राज्य के सभी वरिष्ठ अधिकारियों को स्पष्ट रूप से कहा है कि मानव तस्करी निरोधक थानों (AHT Police Stations) को अब पूर्ण थाना स्वरूप में विकसित किया जाए और उन्हें आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित किया जाए।
डीजीपी ने यह भी कहा कि मानव तस्करी को अब साधारण अपराध नहीं, बल्कि वैश्विक संगठित अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए। यह अपराध यौन शोषण, जबरन मजदूरी, अवैध गोद लेने, अंग व्यापार और नशीली दवाओं की तस्करी जैसी भयावह गतिविधियों से जुड़ा है, जो समाज की सबसे कमजोर कड़ी, महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाती है।
उन्होंने निर्देश दिया कि हर जिले में मानव तस्करी निरोधक थानों को वाहन, कंप्यूटर, कैमरे और वायरलेस सेट जैसी आवश्यक सुविधाओं से लैस किया जाए। साथ ही, इन थानों में एक निरीक्षक, दो उपनिरीक्षक, दो मुख्य आरक्षी और दो आरक्षी की अनिवार्य तैनाती रहे। महत्वपूर्ण यह भी है कि इन थानों में तैनात पुलिसकर्मियों को कानून-व्यवस्था या सामान्य गश्त के काम में नहीं लगाया जाएगा, ताकि उनका पूरा ध्यान तस्करी से जुड़े मामलों पर केंद्रित रहे।
डीजीपी राजीव कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि तस्करी से संबंधित हर शिकायत पर तुरंत प्राथमिकी दर्ज की जाए और रेस्क्यू अभियान में किसी भी तरह की देरी न हो। यदि किसी सामान्य थाने में मानव तस्करी की शिकायत दर्ज होती है, तो मामला 24 घंटे के भीतर मानव तस्करी निरोधक थाने को सौंपना अनिवार्य होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि गुमशुदा बच्चों के मामलों में यदि तस्करी के प्रमाण मिलते हैं, तो वह मामला संबंधित जिला पुलिस प्रमुख या आयुक्त के आदेश से एएचटी थाने को हस्तांतरित किया जाए।
सिर्फ बचाव ही नहीं, डीजीपी ने पीड़ितों के पुनर्वास, चिकित्सा, परामर्श, कानूनी सहायता और मुआवज़ा तक की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास और विधिक सेवा प्राधिकरण जैसे विभागों से तालमेल ज़रूरी बताया गया है।
राज्य के सभी जिलों में हर महीने अपराध समीक्षा बैठकों में एएचटी थानों के कामकाज की समीक्षा अनिवार्य की गई है। छह महीने से ज़्यादा पुराने मामलों पर तिमाही समीक्षा होगी, ताकि किसी भी मामले में देरी या लापरवाही न हो सके।
डीजीपी ने यह भी चेतावनी दी कि बचाव अभियान में लापरवाही पर स्थानीय थाना और एएचटी थाना दोनों की जवाबदेही तय की जाएगी। यह संदेश साफ है, अब मानव तस्करी के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।
यह पहल न केवल पुलिस व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि उन परिवारों के लिए भी उम्मीद की किरण है जो अपने खोए हुए बच्चों की तलाश में वर्षों से भटक रहे हैं। अगर यह अभियान जमीनी स्तर तक उसी गंभीरता से लागू हुआ, तो यह केवल अपराध के खिलाफ नहीं, बल्कि मानवता की रक्षा की लड़ाई बन सकता है।