ग्रेटर नोएडा में श्रमिकों से मिलने जा रहे सपा नेता हाउस अरेस्ट, पुलिस लाइन भेजा गया
NEWS1UP
संवाददाता
ग्रेटर नोएडा। ग्रेटर नोएडा में श्रमिकों के समर्थन में उतर रही समाजवादी पार्टी (सपा) को उस समय बड़ा झटका लगा, जब पार्टी के छह से अधिक नेताओं को हाउस अरेस्ट कर लिया गया। ये सभी नेता आज नोएडा में प्रदर्शनकारी मजदूरों से मुलाकात करने वाले थे। प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है।
सपा प्रतिनिधिमंडल को रास्ते में रोका गया
जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे एक प्रतिनिधिमंडल के साथ श्रमिकों से मिलने नोएडा पहुंचे थे। लेकिन पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। बाद में माता प्रसाद पांडे, अतुल प्रधान और अन्य सपा नेताओं को पुलिस लाइन ले जाया गया।
भाजपा सरकार पर लगाया गंभीर आरोप
माता प्रसाद पांडे ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि मजदूरों के साथ अन्याय हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि श्रमिक अपनी पूरी मजदूरी न मिलने के कारण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन सरकार ने उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया।
उन्होंने कहा-
“मैं प्रतिनिधिमंडल के साथ यहां आया था। यहां मजदूरों पर लाठीचार्ज हुआ। उन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिल रही थी। मैंने पहले भी सरकार का ध्यान इस मामले की ओर दिलाया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।”
उन्होंने श्रम विभाग के अधिकारियों पर भी लापरवाही का आरोप लगाया और कहा कि यदि समय रहते मजदूरों की समस्याओं का समाधान किया जाता तो हालात इतने नहीं बिगड़ते।
सपा ने गठित किया था विशेष प्रतिनिधिमंडल
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देश पर मजदूरों से मिलने के लिए एक विशेष प्रतिनिधिमंडल बनाया गया था। इसमें माता प्रसाद पांडे, सुधीर भाटी, आशा गुप्ता, शाहिद मंजूर, कमाल अख्तर, अतुल प्रधान, पंकज मलिक, शशांक यादव, फकीर चंद्र नागर, राजकुमार भाटी, वीर सिंह यादव और सुनील चौधरी शामिल थे।
सीपीएम प्रतिनिधिमंडल भी पहुंचा, पुलिस ने रोका
इधर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम का एक प्रतिनिधिमंडल भी श्रमिकों से मिलने डीएनडी पहुंचा। वहां पहले से भारी पुलिस बल तैनात था। पुलिस द्वारा रोके जाने पर सीपीएम नेता वहीं धरने पर बैठ गए।
मजदूर आंदोलन बना राजनीतिक मुद्दा
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में मजदूरों का वेतन, श्रमिक अधिकार और प्रशासनिक कार्रवाई का मामला अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है। विपक्ष इसे मजदूरों की आवाज दबाने की कोशिश बता रहा है, जबकि प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने की बात कह रहा है।
