क्या इस बार चल पड़ेगी ई–साइकिल ? ग्रेटर नोएडा ने दी हरी झंडी, पर नोएडा की विफलता बनी साया!

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BOT मॉडल, परफॉर्मेंस शर्तें और निगरानी

प्राधिकरण का दावा, चुनौतियों से निपटने की तैयारी पूरी

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

ग्रेटर नोएडा।  प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में शहर के लिए बहुप्रतीक्षित ई–साइकिलिंग प्रोजेक्ट को औपचारिक मंजूरी दे दी गई। यह योजना सार्वजनिक परिवहन को हरित, सुलभ और किफायती बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी उठ रहा है, क्या यह योजना सच में जमीन पर उतर पाएगी ?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पड़ोसी नोएडा में यही योजना वर्ष 2023 में बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी है। वहां ई–साइकिल नेटवर्क न केवल अधूरा रहा, बल्कि एक साल के भीतर पूरी तरह बंद हो गया। ऐसे में ग्रेटर नोएडा का प्रयास उम्मीद भी जगाता है और आशंका भी।

क्यों असफल हुई नोएडा की योजना?

नोएडा के अनुभव ने कई कमियां उजागर कीं, मसलन- ऑपरेटर ने तय समय में सभी स्टेशन स्थापित नहीं किए, सेवा बाधित होती रही, मेंटेनेंस कमजोर रहा, नोटिसों के बावजूद सुधार नहीं, निगरानी और अनुबंध प्रवर्तन ढीला, आखिरकार स्थिति इतनी बिगड़ी कि ऑपरेटर की ब्लैकलिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। यही उदाहरण अब ग्रेटर नोएडा के सामने चेतावनी की तरह खड़ा है।

ग्रेटर नोएडा के सामने मुख्य चुनौतियाँ

विशेषज्ञों और अधिकारियों के मुताबिक प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए कुछ प्रमुख बाधाओं से निपटना होगा:

 समय पर इंफ्रास्टक्चर स्थापना

देर होते ही उपयोगकर्ता भरोसा खो देते हैं। तय समयसीमा का कठोर पालन आसान नहीं होगा। 

 लगातार और गुणवत्ता वाली सेवा

चार्जिंग, मरम्मत, उपलब्धता, किसी भी जगह कमी हो तो नेटवर्क टूट जाता है।ऑपरेशन मॉनिटरिंग असंभव तो नहीं परन्तु मुश्किल टास्क जरूर है। 

 उपयोगकर्ता अपनापन (User Adoption)

लोग तभी इस्तेमाल करते हैं जब सुविधा आसान और विश्वसनीय हो। वास्तविक उपयोग बढ़ाना भी काम मुश्किल नहीं होगा। 

 अनुबंध अनुपालन

नोएडा में सबसे बड़ी चूक यहीं हुई थी। उल्लंघन पर तुरंत कार्रवाई प्रमुख चुनौती होगी।  

ग्रेटर नोएडा कैसे निपटेगा इनसे ?

अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि इस बार व्यवस्था अधिक सख्त और संरचित होगी- 

 BOT मॉडल – जोखिम और निवेश एजेंसी पर
 25 वर्गमीटर स्पेस तय, स्पष्ट लोकेशन आवंटन
 परफॉर्मेंस-बेस्ड शर्तें
 मॉनिटरिंग सेल का गठन प्रस्तावित
 स्टेज–वाइज एक्सपेंशन चेकलिस्ट
 दंडात्मक प्रावधान और समयबद्ध समीक्षा

प्राधिकरण का मानना है कि यदि ये कदम बिना ढील के लागू हुए तो योजना केवल शुरू ही नहीं होगी बल्कि टिकाऊ भी साबित हो सकती है।

ग्रेटर नोएडा के लिए अवसर क्यों बड़ा है ?

बढ़ती जनसंख्या, ऊंचा निजी वाहन दबाव, मेट्रो–फीडर और अंतिम मील की जरूरत, प्रदूषण घटाने की आवश्यकता, युवाओं और कार्यस्थलों वाला गतिशील शहर, ये सभी कारक प्रोजेक्ट की सफलता की संभावना को मजबूत बनाते हैं, बशर्ते संचालन निरंतर और भरोसेमंद रहे।

नोएडा की नाकामी ने यह साफ कर दिया है कि केवल लॉन्च कर देना पर्याप्त नहीं, योजना को चलाना और बनाए रखना ही असली परीक्षा है। ग्रेटर नोएडा की 141वीं बोर्ड बैठक में मिली हरी झंडी अब जिम्मेदारी, निगरानी और जवाबदेही की कसौटी बन चुकी है।

अब सभी की नजरें इसी पर टिकी हैं कि क्या यह योजना वास्तव में शहर की सड़कों पर दौड़ेगी या फाइलों में धूल फांकने को मजबूर होगी ?

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