गाजियाबाद हाउस टैक्स: नगरायुक्त ने दिलाया राहत का भरोसा, पूर्व पार्षद ने उठाए सवाल
निगम प्रशासन ने छूट और राहत पर दिया जोर
पूर्व पार्षद बोले, जमीनी स्तर पर बढ़ेंगी दिक्कतें
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। हाउस टैक्स में बढ़ोतरी को लेकर शहर में बहस तेज हो गई है। एक ओर नगर आयुक्त विक्रमादित्य सिंह मलिक का कहना है कि नई व्यवस्था में वास्तविक बढ़ोतरी केवल 10 से 20 प्रतिशत के बीच सीमित है और छूट के प्रावधानों से आम नागरिकों को राहत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भाजपा के पूर्व पार्षद हिमांशु मित्तल ने इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
सीमित बढ़ोतरी, व्यापक राहत: नगर आयुक्त

नगर आयुक्त विक्रमादित्य सिंह मलिक ने स्पष्ट किया कि हाउस टैक्स में वास्तविक बढ़ोतरी केवल 10 से 20 प्रतिशत के बीच ही है। उनके अनुसार, नई दरें लागू करते समय कई संशोधन किए गए हैं ताकि आम नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
नगर आयुक्त ने विस्तार से बताया कि-
भवनों की आयु के आधार पर 25% से 40% तक छूट दी जा रही है।
समय पर टैक्स जमा करने पर 20% तक की छूट का प्रावधान है।
ऑनलाइन भुगतान पर अतिरिक्त 2% की राहत दी जा रही है।
कूड़ा पृथक्करण करने पर 10% तक की छूट भी लागू है।
नगर आयुक्त के अनुसार, इन सभी छूटों को मिलाकर प्रभावी कर भार काफी कम हो जाता है और कई मामलों में कुल छूट 80-90 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सड़क की चौड़ाई और क्षेत्र की स्थिति के आधार पर दरों में संशोधन कर संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।
व्यावसायिक संपत्तियों पर उन्होंने संकेत दिया कि दरें अलग श्रेणी में निर्धारित हैं, लेकिन उनकी गणना भी निर्धारित मानकों के अनुसार ही की जा रही है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और निगम की आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें।
दावे और जमीनी हकीकत में अंतर: पूर्व पार्षद

दूसरी ओर, पूर्व पार्षद हिमांशु मित्तल ने नगर आयुक्त के दावों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि बढ़ोतरी वास्तव में 10-20 प्रतिशत ही है, तो पुराने टैक्स में सीधे इतनी ही वृद्धि कर दी जाए, ताकि विवाद खत्म हो जाए।
हिमांशु मित्तल का कहना है कि-
व्यावसायिक भवनों पर कर दरें स्पष्ट नहीं हैं, जिससे व्यापारियों में असमंजस है।
आवासीय भवनों को दी जा रही छूट क्या व्यावसायिक भवनों को भी मिलेगी, इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
कूड़ा पृथक्करण की छूट कैसे मिलेगी, इसकी प्रक्रिया आम नागरिक को समझ नहीं आ रही।
मित्तल ने इस प्रक्रिया को “इंस्पेक्टर राज” की वापसी होने जैसा बताया। उनके अनुसार भवन की आयु (10 वर्ष, 20 वर्ष, 25 वर्ष आदि) साबित करने के लिए नागरिकों को बार-बार निगम कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ेंगे। सत्यापन की यह प्रक्रिया अधिकारियों के विवेक पर निर्भर होगी, जिससे भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर बिना लेन-देन के काम होना मुश्किल हो सकता है।
मित्तल ने दावा किया कि पुरानी कर प्रणाली सरल, पारदर्शी और समझने में आसान थी, जबकि नई प्रणाली आम आदमी के लिए जटिल बन रही है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्रशासन चाहे तो वह खुद मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति दिखाने को तैयार हैं। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि जनता में भ्रम हम नहीं, नगरायुक्त फैला रहे हैं।
