40 कॉल, 6 घंटे इंतज़ार, एंबुलेंस फिर भी नहीं पहुंची
NEWS1UP
महोबा। यूपी के महोबा के जिला अस्पताल में बीती रविवार रात (23 नवंबर) एक ऐसा दिल दहला देने वाला मामला सामने आया जिसने न सिर्फ़ एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई को भी बेनकाब कर दिया। घायल मजदूर धीरज को डॉक्टरों ने गंभीर हालत देखते हुए मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर तो कर दिया, लेकिन सरकारी एंबुलेंस सेवा 108 छह घंटे तक उपलब्ध नहीं हो सकी। तब तक बहुत देर हो चुकी थी और धीरज ने अस्पताल के बिस्तर पर ही दम तोड़ दिया।

परिजनों ने बताया कि कुल 40 बार एंबुलेंस के लिए फोन किए गए, पर हर बार वही जवाब “सभी एंबुलेंस फुल हैं” गरीबी के कारण निजी एंबुलेंस का खर्च उठाना संभव नहीं था, और इसी मजबूरी और सरकारी लापरवाही के बीच धीरज की सांसें थम गईं।
टक्कर, खून और बदहवासी, पर इलाज कहाँ ?
धीरज, जो अतरारमाफ गांव का निवासी था और पठा रोड इलाके में किराए के मकान में रहकर मजदूरी करता था, रविवार शाम बाइक से लौट रहा था। कैमाहा के पास एक अज्ञात चार पहिया वाहन ने उसे जोरदार टक्कर मार दी। परिवार उसे किसी तरह जिला अस्पताल लेकर पहुँचा, जहाँ डॉक्टरों ने तुरंत रेफर कर दिया, पर रेफर के बाद शुरू हुआ एक भयावह इंतज़ार।
परिजनों की चीख: कोई सुनने वाला नहीं
धीरज के भांजे भोला प्रसाद ने रोते हुए कहा-
“डॉक्टर ने रेफर कर दिया, हमने 40 बार फोन किया, पर हर बार कहा गया कि एंबुलेंस फुल है। हम गरीब हैं, प्राइवेट एंबुलेंस का पैसा नहीं था। इसी लापरवाही में उनकी जान चली गई।”
धीरज के पीछे उसकी पत्नी सुनीता और तीन छोटे बच्चे रह गए हैं, अब बेबस, बेसहारा और टूटे हुए।
विकास को पलीता लगा रहा सिस्टम
आज देश में आधुनिक प्रगति के दावे जोर-शोर से किए जा रहे हैं। Technology, Digital India, Smart Services, सबके नाम गूंजते हैं। पर सच इतना कड़वा क्यों है कि पिज़्ज़ा, बर्गर, फास्ट फूड मिनटों में घर तक पहुँच जाता है…लेकिन एंबुलेंस, जिसका काम ज़िंदगी बचाना है, वह 6 घंटे में भी नहीं पहुँचती।
आख़िर ये कैसी तरक्की है?
क्या इंसान की जान की कीमत अब पिज़्ज़ा और बर्गर से भी सस्ती हो चुकी है ? क्या यह आधुनिकता का अपमान नहीं? क्या यह शासन, प्रशासन और स्वास्थ्य तंत्र पर सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह नहीं ?
सिस्टम को चेतावनी
यह हादसा केवल एक घटना नहीं, बल्कि संकेत है कि आपातकालीन सेवाएँ ठप हैं, गरीबों की पहुँच अब भी इलाज से बाहर है। स्वास्थ्य ढाँचा कागज़ों में ही चमकता है, और आम आदमी की जान… साँसों पर नहीं, सिस्टम पर टिकी है।
स्थानीय लोग और परिजन प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि ज़िम्मेदारों पर कार्रवाई हो, एंबुलेंस प्रणाली सुधारी जाए और ऐसी लापरवाही दोबारा किसी की जान न ले।