शिव कला चार्म्स विवाद में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल: 20 साल से फंसे सैकड़ों ‘होम बायर्स’ को न्याय की उम्मीद!
न्यायमूर्ति पंकज नक़वी की समिति करेगी तय
कौन हैं असली खरीदार, कैसे पूरी होगी अधूरी इमारत
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
नई दिल्ली/ग्रेटर नोएडा। की बहुचर्चित ‘शिव कला चार्म्स’ हाउसिंग परियोजना विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। लगभग दो दशकों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे सैकड़ों फ्लैट खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए अदालत ने 7 नवम्बर को एक स्वतंत्र जांच समिति गठित करने का आदेश दिया, जिसकी अध्यक्षता इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) पंकज नक़वी करेंगे।
यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने पारित किया, जो 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय से संबंधित अपीलों की सुनवाई कर रही थी जिसमें खरीदारों को मूल (substantive) राहत देने से इंकार किया गया था।
2004 से शुरू, पर अधूरी रही परियोजना

वर्ष 2004 में ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) ने सेक्टर पीआई-2 स्थित 10,000 वर्गमीटर भूमि गोल्फ कोर्स सहकारी आवास समिति (GCSAS) को समूह आवास योजना के लिए आवंटित की थी। समिति ने बाद में शिव कला डेवलपर्स प्रा. लि. के साथ समझौता कर “शिव कला चार्म्स” नामक परियोजना लॉन्च की।
कुछ ही वर्षों में आरोप लगे कि खरीदारों से एकत्रित करोड़ों रुपये डेवलपर और समिति पदाधिकारियों ने हेराफेरी कर दूसरे कार्यों में लगा दिए। देय भुगतान न करने पर GNIDA ने सितम्बर 2011 में लीज निरस्त कर दी, और दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने डेवलपरों के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश (IPC की धाराएँ 409, 420, 467, 468, 472, 120B) के तहत मुकदमा दर्ज किया।
सुप्रीम कोर्ट की लगातार निगरानी
वर्ष 2021 से सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर निरंतर निगरानी रख रहा है। कोर्ट ने यूपी के पंजीयक, सहकारी समितियों को खरीदारों की सत्यापन प्रक्रिया और GNIDA को लीज की बहाली की संभावना पर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। कई खरीदार समूहों ने कोर्ट को बताया कि वे अपना टॉवर स्वयं पूरा करने को तैयार हैं। तकनीकी रिपोर्टों में टॉवर-1 को मरम्मत व सुदृढ़ीकरण के बाद रहने योग्य बताया गया। इसके बावजूद, GNIDA की उदासीनता और लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण परियोजना अटकी रही।
कोर्ट की टिप्पणी: 20 साल से हारती हुई लड़ाई!
पीठ ने अपने आदेश में कहा —
“खरीदार पिछले लगभग दो दशकों से एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने आर्थिक और मानसिक दोनों स्तरों पर गहरी क्षति झेली है। प्रशासनिक निष्क्रियता ने उनकी पीड़ा और बढ़ा दी है।”
कोर्ट ने स्थिति को “प्रशासनिक गतिरोध (Administrative Logjam)” बताते हुए कहा कि अब परियोजना के पुनरुद्धार के लिए स्वतंत्र पर्यवेक्षण और निष्पक्ष जांच तंत्र आवश्यक है।
प्रोजेक्ट में एक प्रभावित आवंटी कहते हैं-
यह केवल एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की अधूरी उम्मीदों की कहानी है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला खरीदारों के लिए न्याय की नई सुबह साबित हो सकता है।
न्यायमूर्ति पंकज नक़वी समिति की भूमिका और अधिकार
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक-सदस्यीय समिति को निम्न कार्य सौंपे गए हैं-
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सभी वास्तविक आवंटियों की पहचान व सत्यापन।
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इच्छुक खरीदारों की सूची तैयार करना, जो मिलकर अधूरा निर्माण पूरा करना चाहते हैं।
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GNIDA से परामर्श कर लीज की आंशिक बहाली की संभावना तलाशना।
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GNIDA के बकाया देयों का निष्पक्ष वितरण तंत्र तैयार करना।
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परियोजना को समयबद्ध तरीके से पूर्ण करने की विस्तृत योजना बनाना।
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टॉवर-3 व टॉवर-4 के अप्राप्त फ्लैटों की नीलामी द्वारा लागत वसूली के विकल्प सुझाना।
चार महीने में रिपोर्ट, 15 लाख का मानदेय!
समिति को अपनी जांच शुरू होने की तारीख से चार महीने के भीतर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा करनी होगी। यह समिति दिल्ली या नोएडा में कार्य करेगी, और GNIDA व उत्तर प्रदेश सरकार सभी लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराएंगे। खर्च का वहन राज्य सरकार और खरीदार पक्ष समान रूप से करेंगे। न्यायमूर्ति नक़वी को 15 लाख रूपये का मानदेय तीन किश्तों में दिया जाएगा।
सार्वजनिक सूचना और अगली सुनवाई
कोर्ट ने GNIDA और यूपी सरकार को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की सूचना अंग्रेज़ी व हिंदी दोनों भाषाओं के समाचारपत्रों में प्रकाशित करें, ताकि वे आवंटी भी सूचित हो सकें जो अब तक अदालत नहीं पहुँचे हैं। मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च, 2026 को होगी, जब समिति की रिपोर्ट पर आगे की कार्यवाही तय की जाएगी।
