न्याय या चूक ? निठारी कांड में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को दी रिहाई!
डीएनए रिपोर्ट अधूरी, फॉरेंसिक मिलान संदिग्ध, गवाह मुकर गए
कोर्ट ने कहा, “ऐसी जांच न्याय के उद्देश्य को कमजोर करती है”

NEWS1UP
विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। लगभग दो दशकों से भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे भयावह मामलों में गिना जाने वाला निठारी सीरियल किलिंग केस अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने आदेश में 2006 के इस चर्चित मामले के आरोपी सुरेंद्र कोली को सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी दोषसिद्धि और मृत्युदंड को रद्द कर दिया। आदेश में कहा गया है कि “यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।” निठारी के उस घर की नाली से जब खोपड़ियाँ निकलीं, तो पूरा देश सिहर उठा था। आज वही मामला अदालत में ठोस साक्ष्य के अभाव में ढह गया।
19 साल बाद न्यायिक निष्कर्ष
नोएडा के निठारी गाँव में 2005-06 के बीच हुई दर्जनों बच्चों और महिलाओं की गुमशुदगी ने पूरे देश को झकझोर दिया था। दिसंबर 2006 में जब एक मकान की नाली से खोपड़ियाँ और हड्डियाँ मिलीं, तो दृश्य इतना भयावह था कि लोग सिहर उठे। मकान उद्योगपति मनिंदर सिंह पंढेर का था, और नौकर सुरेंद्र कोली पर हत्या, यौन उत्पीड़न व नरभक्षण जैसे आरोप लगे। तत्कालीन पुलिस व बाद में CBI की जाँच में कोली को 14 मामलों में दोषी ठहराया गया और उसे मृत्युदंड मिला।
लेकिन वर्षों बाद, 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पाया कि यह पूरी कहानी संदिग्ध साक्ष्यों पर टिकी थी।
अदालत ने लिखा–
“जाँच एजेंसियों ने जिस लापरवाही से साक्ष्य इकट्ठा किए, उससे न्याय का उद्देश्य ही प्रभावित हुआ है।”
हाई कोर्ट के इसी फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन “शक से परे” अपराध सिद्ध करने में विफल रहा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: साक्ष्य नहीं, संदेह अधिक
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई , न्यायमूर्ति सूर्या कांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने अपने निर्णय में कहा-
“परिस्थितिजन्य साक्ष्य तभी स्वीकार्य होते हैं जब वे एक निरंतर श्रृंखला में केवल दोषी की ओर इशारा करें। इस मामले में वह श्रृंखला टूट चुकी थी।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी के कबूलनामे को स्वतंत्र साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह “मजिस्ट्रेट के समक्ष विधिसम्मत तरीके से दर्ज नहीं हुआ” था।
CBI और अभियोजन पर अदालत की नाराज़गी
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी CBI की भूमिका पर असंतोष जताते हुए कहा कि फॉरेंसिक जांच अधूरी रही, DNA रिपोर्ट्स का मिलान सटीक नहीं था, और कई आवश्यक दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश ही नहीं किए गए।
कानूनी विशेषज्ञों की नजर में-
“यह एक ऐसी त्रासदी है जहाँ न अपराध साबित हो सका, न पीड़ितों का दर्द कम हुआ।”
हमारा भरोसा टूटा है: पीड़ित परिवार
निठारी के एक पीड़ित पिता ने भावुक स्वर में कहा-
“हमने 19 साल तक अदालतों के चक्कर लगाए। आज हमें न्याय नहीं, निराशा मिली है।”
वहीं, कोली के वकील ने इसे “न्याय की जीत” बताया
“सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिना ठोस साक्ष्य के किसी को मौत की सजा देना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”
न्याय बनाम जांच: कौन जिम्मेदार ?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारतीय जांच प्रणाली की गहराई में छिपी खामियों को उजागर करता है।
एक वरिष्ठ कानूनविद कहते हैं-
“यह केस बताता है कि भावनाओं के बजाय प्रक्रिया का पालन कितना महत्वपूर्ण है। जांच एजेंसियों की छोटी चूकें बड़े अपराधों को न्याय से दूर कर देती हैं।”
डर, मीडिया और न्याय का संघर्ष
निठारी केस भारतीय मीडिया के लिए भी एक संवेदनशील अध्याय रहा। सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने लोगों में भय और गुस्सा भर दिया था। लेकिन अब अदालत के आदेश के बाद वही केस न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता का आईना बन गया है।
एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं-
“निठारी ने समाज को भय दिखाया, अब वही मामला हमें सबक देता है कि न्याय जल्दबाज़ी में नहीं दिया जा सकता।”
न्यायालय का संदेश
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम संदेश साफ़ है-
“भले ही अपराध कितना भी जघन्य हो, परंतु न्याय केवल ठोस साक्ष्य और विधिक प्रक्रिया के आधार पर ही दिया जा सकता है। संदेह कभी भी दोषसिद्धि का विकल्प नहीं बन सकता।”
फैसले के बाद आगे क्या ?
अगर सुरेंद्र कोली पर किसी अन्य लंबित मामले में गिरफ्तारी वारंट नहीं है, तो उसे जेल से रिहा किया जाएगा। CBI ने संकेत दिया है कि वह फैसले का अध्ययन करने के बाद “रीव्यू पिटीशन” दाखिल करने पर विचार करेगी।
निठारी का यह अंत किसी राहत की कहानी नहीं है यह न्याय की दुःसाध्य यात्रा का दस्तावेज है। जहाँ एक ओर अदालत ने न्यायिक सिद्धांतों की रक्षा की, वहीं दूसरी ओर 19 साल से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवारों के लिए यह एक दर्दनाक स्मृति बन गया। न्याय कभी-कभी बहुत देर से आता है, और जब आता है, तो वह अपने साथ एक प्रश्न भी छोड़ जाता है कि क्या यह देर भी एक प्रकार का अन्याय थी ?
