ये नये लोग ये नई दुनियां: संजीव शर्मा (कवि)

क्या मालूम…
ये नये लोग ये नई दुनियां ,
चाहती क्या है जाने क्या मालूम।
दौर दुनियां में रंजिशों का है,
सोचती क्या है जाने क्या मालूम।
अब तो कुछ भी पता नहीं चलता,
हाथ कोई कहाँ छुड़ा लेगा।
जब हवा भी ज़हर भरी होगी,
बेवफ़ा जिंदगी का क्या मालूम।
हर तरफ़ शोर बेतुका सा है,
आग है सब धुआँ धुआँ सा है।
तीरगी छा गई दिमागों में,
खौफ़ कितना है जाने क्या मालूम।
नफ़रतें इस कदर बढ़ा लीं हैं,
तंग रहता है आदमी ख़ुद से।
होड़ ऐसी कि घुट रहा है दम,
जीतना चाहता है क्या मालूम।
हम है उम्मीद जगाने वाले,
दीप आशा के जलाने वाले।
रुख़ हवाओं का हम बदल देंगे,
हौसला आँधियों को क्या मालूम।
साथ लेकर चलेंगे दुनियां को,
हम सहारा बनेंगे मुश्किल में।
हम विखरने नहीं देंगे कुछ भी,
सिरफिरे दुश्मनों को क्या मालूम।
संजीव शर्मा (कवि)
पूर्व पार्षद गांधीनगर
गाज़ियाबाद
9311559382
